Sunday, January 27, 2013

अनिश्चित और अनायास की लय


लय को अगर क्षणों में तोड़ा जाए तो पेश आने वाले व्यतिक्रमों से भी एक लय बनाई जा सकती है। किसी जमाने में अतियथार्थवाद ने जब यथार्थवाद को उसकी सीमा बताई थी तो शायद उसने यही किया था। पूरी पश्चिमी कला मानो इसी क्षण की दूरबीन से संसार की कैफियत जानने की कोशिश में लगी है। जैसे समय के अनंत भंडार में यह क्षण मौजूद है वैसे ही लोगों के हुजूम में व्यक्ति। सभ्यता के ऊबड़खाबड़ विस्तार में व्यक्ति की हर गति समय से उसके संबंध का सबूत है। बीते दिनों अभिमंच प्रेक्षागृह में हुई पोलिश प्रस्तुतिआफ्टर द बर्ड्स एक कथानक को ऐसी ही बहुत सी गतियों में तब्दील करती है। इस क्रम में शरीर एक स्वयंभू उपकरण हो गया है। इस तरह वह क्षण की वास्तविकता को परखता है। एक लड़की फर्श पर पेट में पैर दिए पड़ी है, दूसरी आकर उसे सीधा करती है। पर पड़ी हुई लड़की किसी रबड़ के बड़े टुकड़े की तरह फिर से वैसे ही मुड़ गई है। प्रस्तुति में पात्रगण बहुत से एकाकी लोगों का समूह नजर आते हैं। वे सहज भाव से शरीर के मुश्किल करतब करते हैं। वे एक कोरस में गाते हुए इधर से उधर जाते हैं। रास्ते में पड़े एक पात्र से बेपरवाह वे चले जा रहे हैं। एक पात्र माइक पकड़े हुए कई तरह के स्वर निकाल रहा है और दूसरे पात्र का शरीर इन स्वरों की लय पर थिरक रहा है। अचानक वह चुप हो जाता है। नाच रहा शरीर हवा में वैसे ही रुक गया है। फिर वह अचानक ऊss बोलता है, शरीर भी उतना ही हिलता है, फिर वे एss बोलता है और शरीर उतना ही जुंबिश करता है। माइक पर स्वर के अवरोह के साथ शरीर की यह जुगलबंदी देखने लायक है। पूरी प्रस्तुति इसी तरह एक अव्यवस्था में मानो लय की युक्तियां तलाश करती है। यह  प्राचीन ग्रीक नाटककार एरिस्टोफेनस के नाटकद बर्ड्स की एक दिलचस्प अभिव्यक्ति है। मंच पर एक मचान है। वहां खड़ी एक पात्र काफी उत्तेजना में कुछ बोलते हुए अपने में ही तल्लीन है। दो बंदे उसे देखते हैं। थोड़ी देर में वह नीचे उतर आई है। उसी तरह तन्मय और उत्तेजित। दर्शकों की ओर मुखातिब वह उत्तेजना में बड़बड़ाते हुए जोर से पैर पटकती है। उसके पीछे खड़े दोनों बंदे पीटे जाते हुए लोगों की तरह डर से कांप रहे हैं। वह फिर पैर पटकती है और वे बिलखने लगते हैं। एक युगल आपस में लिपटा हुए खड़ा है कि अचानक लड़की धड़ाम से गिर पड़ती है। प्रस्तुति में कोरस और एकल गायकी के स्वर भी उसका एक रुचिकर पक्ष हैं। प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि हर चीज काफी अनिश्चित और अनायास ढंग से यहां मौजूद है। कई बार किसी स्थिति को बार-बार के दोहराव के जरिए भी खंगाला गया है।
निर्देशकीय वक्तव्य के मुताबिक एरिस्टोफेनस के समय में स्पार्टा से बार-बार के युद्धों की वजह से  पैदा हुए राजनीतिक संकट ने सामाजिक और धार्मिक मूल्यों को काफी कमजोर किया और अलग-अलग गुटों में सत्ता संघर्ष को तेज किया। ऐसे हालात में हमेशा ही कोई मार्गदर्शक सामने आता है जिसके नेतृत्व में आदर्श दुनिया के किसी विचार को पुराने खंडहरों के ऊपर एक अमली जामा पहनाया जा सकता है। इस तरह पराजित और विजित के बीच  लोकप्रिय नारों और गठजोड़ों वगैरह की एक दुनिया बनती है। पराजित और विजय हासिल करने वाली ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे के बगैर नहीं रह सकतीं। निर्देशक सवाल करते हैं कि क्या धरती पर स्वर्ग सिर्फ कंटीले तारों की बाड़ से घिरा हुआ होगा? उत्तर कम्युनिस्ट राज्य और वैश्विक आतंकवाद के इस युग में नाटक के खेले जाने के दौरान हम ये प्रश्न सिर्फ एरिस्टोफेनस पर नहीं थोप सकते। उनके मुताबिक यह नाटक इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की एक कोशिश है कि प्राचीन ग्रीक और उनकी संस्कृति के बाद रहा क्या है और हमारे और उनमें क्या है जो सामान्य है। कोरेया और अर्थफुल थिएटर ग्रुपों की यह प्रस्तुति तीन निर्देशकों- जेसिका कोहेन, जिम एन्निस और टोमास्ज रोडोविक्ज- द्वारा तैयार की गई है।

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