Tuesday, January 1, 2013

एकालापों से बनता संवाद

वरिष्ठ रंग निर्देशक सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुतियां प्रायः एक सादगी लिए होती हैं। उनमें कम पात्र होते हैंलिहाजा अभिनय का स्पेस ज्यादा बन पाता है। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में लाइट डिजाइन के प्रोफेसर हैंऐसे में जाहिर ही प्रकाश योजना दूसरा ऐसा तत्त्व है जिसका गहरा असर उनकी प्रस्तुतियों में महसूस किया जा सकता है। प्रायः वे अपने दृश्य शांत रोशनियों से ही तैयार करते हैं। कहीं कोई शोर शराबा नहीं। मंच पर बोला जा रहा एक-एक शब्द अपनी गहराई और विस्तार में दर्शकों तक संप्रेषित है। अपने ग्रुप आकार कला संगम के जरिए वे अरसे से इसी शैली में काम करते आए हैं। लेकिन इधर के अरसे में उनकी इस शैली में कुछ क्लीशे काफी साफ दिखने लगे हैं। साहित्य कला परिषद के मॉडर्न थिएटर फेस्टिवल में उनकी प्रस्तुति मठ के रास्ते में एक दिन में भी ये दिखते हैं। एक बड़ा क्लीशे यह है कि उनके यहां दृश्य जैसे एक दोहराव में आगे बढ़ता है। वही वही पात्र मानो प्रस्तुति जितने लंबे दृश्य का हिस्सा हों। हो सकता है यह आलेख का दोष हो, पर आखिर उसका चुनाव तो निर्देशक ने ही किया है।
सतीश आलेकर का यह तीन पात्रीय नाटक है। एक कम उम्र युवक किसी मठ की ओर जा रहा है। वह रास्ते में टोपी लगाए मिले एक उम्रदराज शख्स से मठ का रास्ता पूछता है। इस तरह उनमें परिचय होता है। उनकी बातचीत में कोई अनिवार्य सिलसिला नहीं है, बल्कि एक रहस्यात्मकता, थोड़ी असंगति और थोड़ी यथार्थसम्मतता है। एक-दूसरे से वाकिफ होने के क्रम में वे एक दूसरे में अपनी जिंदगी की छवियां ढूंढ़ते हैं। लड़का बताता है कि उसका बाप गाइड था। इसी दौरान पीछे लगी स्क्रीन पर देवानंद सहित पुराने फिल्मी नायकों की तस्वीरें उभरती हैं। बहुत से असंबद्ध ब्योरे उनकी बातचीत में पेश आते हैं। लड़का व्यक्ति में पिता की छवि देख रहा है। वह अपने मोबाइल पर उसे अपनी मां की तस्वीर दिखाता है, जो कि पीछे स्क्रीन पर उभर आई है। व्यक्ति उस तस्वीर में अपनी बीवी को पाकर हतप्रभ है। नाटक की तीसरी पात्र लड़के की दोस्त मिठाईवाले की बेटी है। उसके दृश्य में आने के थोड़ी देर बाद लड़का वहां से चला जाता है, और बचे दो पात्रों का संवाद देर तक चलता रहता है। धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि यह संवाद तीन एकालापों का परिणाम है। पुरुष कहता है- हम कब अपने दायरों में सिमटते रहते हैं, पता ही नहीं चलता। लड़की कहती है- मैंने जिंदा रहते हुए भी मौत को महसूस किया है।
प्रस्तुति का पूरा ढांचा एक छायावादी गुत्थी की तरह है। उसका कोई स्पष्ट अर्थ विन्यास करना अनुपयुक्त होगा। सुरेश भारद्वाज इसे कुछ इतर उपायों के जरिए रोचक बनाने की चेष्टा करते हैं। हेमंत कुमार का गाया गीत ऐ दिल कहां तेरी मंजिल प्रस्तति के थीम सांग की तरह मंच से सुनाई देता है। पुरानी फिल्मों की तस्वीरें और दृश्य और गीत आदि भी प्रस्तुति में निरंतर शामिल हैं। मुख्य भूमिका में सुमन वैद मंच पर हैं, पर जाने क्यों इधर के दिनों में वे लगातार एक टाइप्ड किस्म की अभिनय शैली में फंसे हुए से नजर आने लगे हैं। उनके किरदार का संतुलन उनके अभिनय से ज्यादा उनकी मेकअप और वेशभूषा में निहित दिखता है। दिलचस्प यह भी है कि जिस वजह से नाटक अमूर्त या आभासी नजर आता है, सुरेश भारद्वाज उसी वजह से इसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। तीन एकालापों का एक यथार्थ में जुड़ना मंचन की दृष्टि से उन्हें विशेष लगता है। लेकिन क्या उसी स्तर पर दर्शक के भी इससे तादात्म्य का कोई तरीका है? ऐसा लगता है जैसे प्रस्तुति स्थितियों के आभासीपन को पुरानी फिल्मों के दृश्यों की मार्फत एक नॉस्टैल्जिया के जरिए रोचक बनाने की कोशिश करती है। कम से कम इस रूप में इसे सफल कहा जा सकता है।

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