Saturday, December 14, 2013

ढाई साल का युग

राजेन्द्र जी से मेरा साथ उनकी 84 बरस की उम्र के अंतिम ढाई सालों में रहा. इन ढाई में से बाद वाले एक-डेढ़ साल में हमारी अच्छी घनिष्ठता हो गई थी. यानी वह खुलापन और भरोसा आ गया था कि हम आपस में दुनियाभर के संदर्भों पर बेलाग हो सकें. राजेन्द्र जी खुलेपन के बगैर नहीं रह सकते थे, और बढ़ती उम्र और शारीरिक असमर्थताओं ने उनके भरोसे की एक भावनात्मक परिधि बना दी थी. इस परिधि में बहुत से लोग अपनी-अपनी वजहों से घुसना चाहते थे, पर जिसपर वस्तुतः दो एक लोगों का ही ठोस ढंग से कब्जा था. राजेन्द्रजी इन घुसने वालों और कब्जा बनाए रखने वालों के रोमांचक खेल में अंपायरिंग करते हुए लगभग हमेशा ही गलत फैसले लिया करते थे. ऐसा वे जानबूझकर नहीं करते थे, बल्कि ये गलत फैसले उनमें इनहेरेंट थे. उनमें उलझावों में जीवन गुजारने की एक अदभुत क्षमता थी. इस तरह वे विपत्तियों से घबराए बगैर निरंतर सक्रिय बने रहते थे. इस लिहाज से यह उपयुक्त ही था कि मैं भावनात्मक के बजाय उनके ज्ञानात्मक भरोसे की परिधि में ही कहीं रहता था. वैसे जहाँ तक भरोसे की बात है, तो राजेन्द्रजी के साथ जीवन का लंबा समय गुजार चुके बहुत से लोग खुद उन्हें एक गैरभरोसेमंद इंसान मानते रहे हैं, पर मुझे लगता है कि ऐसे मामलों में जब हम दूसरों की जटिल बुद्धि को चिह्नित कर रहे होते हैं तो अपनी सरल समझ को अनदेखा भी कर रहे होते हैं. इस अर्थ में यह रिश्तों में गैरभरोसे की समस्या वास्तव में अक्सर अन-सूटेबिलिटी की समस्या होती है. जो भी हो, भारतीय समाज की संरचना के हिसाब से राजेन्द्रजी एक अन-सूटेबल ब्वाय ही थे. वे दूसरों के किरदार से जरूरत भर सूटेबिलिटी का इस्तेमाल करते और आगे बढ़ जाते, और वे सरल हृदय लोग कहते- देखो इन्होंने हमें धोखा दिया है. मेरे हंस में आने के कुछ महीनों बाद एक बार उन्होंने कहा था- अब तक आप कहाँ थे!’ तो मुझे लगा कि हमारा रिश्ता एक-दूसरे को जानने के बाद अब सही तरह से स्थिर हो चुका है.
राजेन्द्रजी एक जटिल किरदार तो थे, पर इसकी वजह उस शारीरिक खोट में निकालना शायद ठीक नहीं होगा, जिसमें कई लोगों ने उनकी ग्रंथियाँ तलाशी हैं. यों मनुष्य की मनोवैज्ञानिक बनावट को समझना हमेशा बहुत पेचीदा मसला होता है, पर फिर भी लगता यह है कि अपनी शारीरिक असमर्थता की हीनता को शायद वे बहुत पहले फतह कर चुके थे. अगर वैसा न होता तो उनके साहित्य में उसकी कोई झलक या भनक जरूर होती. आखिर किसी वैसी कुंठा में जी रहा व्यक्ति जीवन को उस फलक पर कैसे देख सकता था जैसा उनके साहित्य में दिखाई देता है? उनके निजी रिश्तों में जो भी जटिलताएँ रही हैं उनके अपने तर्ईं इसका कारण एक अलहदा किस्म की स्थानच्युतता में है. वे जीवन भर एक अनुपयुक्त समाज के साथ अपने निजता और आधुनिकता के गड्डमड्ड बोध का नाकाम तालमेल बैठाते रहे.
राजेन्द्रजी को पारिभाषिक अर्थ में विचारक कहना पूरी तरह गलत होगा. विचार उनके लिए सचेत बुद्धि का उपक्रम नहीं था. वे कलाकार थे, जो चिंतना को अवचेतन के बोध के रूप में ग्रहण करते थे. उनकी जवानी के दिनों में पश्चिमी दुनिया में जो विचार और अवधारणाएँ प्रचलित थीं, उन सबका थोड़ा-थोड़ा रस उन्होंने ग्रहण किया. पर उन्हें सुलझे हुए ढंग से समझना और तब जीवन में शामिल करना एक मूल रूप से केऑटिक समाज के प्रतिनिधि के बतौर न उनके वश में था, न उनकी एशियाई फितरत को सूट करता था. वरना क्या यह कम अजीब बात है कि सारे बड़े अस्तित्ववादी लेखक राजेन्द्र जी के प्रिय थे, पर खुद उनकी शख्सियत पर (हाल के वर्षों के कुछ डायरी-अंशों को छोड़कर) मृत्युबोध या व्यर्थताबोध को किसी भी तरह फिट नहीं किया जा सकता. यहाँ तक कि कट्टर भगवान-विरोधी होने के बावजूद सार्त्र की तरह ईश्वर की मृत्यु को लेकर आश्वस्त होना उनके लिए जरूरी नहीं था, और इस मसले को स्थगित रखकर ही वे काम चलाते रहे. उनके संपादित आखिरी अंक में अंतिम क्षणों तक कुछ न लिख पाने पर मैंने अपना एक पुराना लिखा हुआ टुकड़ा टॉलस्टाय के ईश्वरउसमें दिया था. पढ़कर वे बोले थे- बहुत अच्छा लिखा है, पर तुम कहाँ इस भगवान-वगवान के चक्कर में पड़े हो. कामू और काफ्का उनके चाहे कितने भी प्रिय रहे हों, पर उनका जिंदगी का अपना यकीन इन क्लासिक पश्चिमी लेखकों की तरह एक मुकम्मल रैशनल आइडिये के तौर पर नहीं हो सकता था. जिस तरह उन लेखकों को मृत्युबोध के सिरे से देखने पर जीवन की व्यर्थता, उसका नरक, और साठ-सत्तर-अस्सी साल में खत्म हो जाने वाले जीवन का इतना सारा झूठ, छल-कपट और इतनी बँधी हुई पराधीन निजता दिखाई दी थी, वैसा राजेन्द्र जी के हिंदुस्तानी आशावाद में संभव नहीं था. वे सारी बौद्धिक कवायद के बावजूद जीवन से बहुत दूर नहीं जा सकते थे. कामू के इस निष्कर्ष कि एक ऐसी दुनिया, जिससे किसी को कुछ हासिल नहीं होता, में स्पष्टता और सार्थकता की ख्वाहिश अंततः व्यक्ति को एक निरर्थकता के अहसास की ओर ले जाती है, जहाँ वह ग्रीक माइथोलॉजी के सिसिफस जैसे अभिशप्त पात्र की तरह जीवन भर उसी एक पत्थर को ढोकर दूसरी जगह पहुँचाया करता है—को राजेन्द्रजी ने अपनी एक अलग रंगत में ग्रहण किया. उनके यहाँ जीवन का नरक फ्रेंच लेदर कहानी का यथार्थवादी नरक था, जिसे तीन जगहों से लौटाया गया, और जिसके लिए उन्हें जीवन की निगेटिविटी का ह्रासोन्मुखी लेखक कहा गया.
राजेन्द्रजी के किरदार में एक ऐसी बुनियादी शिद्दत थी कि उनके बोध हृदय और मस्तिष्क से आगे बढ़कर मानो उनके रक्त और मज्जा में शामिल हो जाते थे. व्यक्ति और समाज का सनातन द्वंद्व उनके लिए एक अनसुलझा बोध था, जिसके अंतर्विरोधों को वे अपनी बहुलक्षित बेपरवाही या निर्लज्जता की मदद से जीवन भर निभाते रहे. पश्चिमी साहित्य के प्रभाव में उनके व्यक्ति को एक मुकम्मल आजादी चाहिए थी पर समाज के बगैर भी वे रह नहीं सकते थे; उनका दांपत्य इस विरोधाभास की सबसे बड़ी मिसाल कहा जा सकता है. लेकिन इस वजह से उनकी शख्सियत में चाहे जितने भी अंतर्विरोध रहे हों, पर उसमें जीवन को बहुत गहरे तक जज्ब किया गया था. उन्हें जो चाहिए था उससे उन्हें रोका नहीं जा सकता था—चाहे वह परिवार की शर्त पर हो या किसी और अंतरंग रिश्ते की शर्त पर. उनसे बराबरी के रिश्ते की एक अनिवार्य शर्त थी— खुद अपनी वास्तविकता को जानते हुए उन्हें इसका अहसास करा देना. इस अर्थ में वे सभी लोग, जिन्होंने राजेन्द्र जी से दुख पाया, को यह कबूल करना चाहिए कि उनका दुख दरअसल उनकी अपनी भावनात्मक बाध्यता थी. विशेष रूप से इसलिए, कि राजेन्द्र जी के अपने व्यक्तित्व में परदुख की कातरता न सही पर उसकी समझ पर्याप्त थी. वे अपनी तरफ से रिश्ता तोड़ना नहीं चाहते थे, पर वास्तव में जो चाहते थे उससे वह टूट ही जाता था. उनकी अंतिम किताब स्वस्थ आदमी के बीमार विचार उनकी उक्त मानसिक बनावट की बहुत अच्छी छवियाँ देती है. यह पुस्तक लिखवाने तक वे उम्र और मनोदशा के उस पड़ाव तक पहुँच चुके थे कि उनके लिए हर चीज मानो एक छवि में तब्दील हो गई थी. चाहे वह लोग हों, चाहे अतीत, या दुनियादारी. कई बार मुझे लगा कि राजेन्द्र जी जैसे स्वाभाविक लोग बहुत दुर्लभ होते हैं. वे अच्छे विश्लेषक नहीं थे, पर उनमें चीजों की बहुत गूढ़ परख थी. वे लोगों की आकृति के भीतर उनके चित्र-विचित्र मनोभावों का एक विहंगम अक्स अपने भीतर उतार लिया करते थे. मैंने किसी के प्रति उन्हें बहुत क्षोभित या प्रसन्न नहीं देखा. हर कोई अपने गुणों-दुर्गुणों के साथ उनके लिए एक छवि भर था. इनमें से कुछ छवियाँ उनके लिए इतनी जरूरी थीं कि वे अगर छुरा लेकर उनपर झपट भी पड़तीं, तो भी उनके मन में उन्हें लेकर कोई दुर्भाव पैदा नहीं हो सकता था. 
राजेन्द्रजी को कई तरह के शारीरिक कष्ट थे, पर उनका मन जीने में इतना व्यस्त था कि कष्टों की ओर ध्यान देने की उन्हें मोहलत नहीं थी. पीड़ा के उग्रतम क्षणों में भी कष्ट उन्हें नहीं घेर पाते थे. उनकी इस जिजीविषा का एक दृश्य मुझे कभी नहीं भूलता. करीब डेढ़ साल पहले जब उनका हार्निया का ऑपरेशन होना था, तो ब्लडप्रेशर कंट्रोल में न आने की वजह से ऑपरेशन बार-बार स्थगित किया जा रहा था. बार-बार की अस्पताल की आवाजाही में, शारीरिक तकलीफ और दवाओं के असर से वे काफी कमजोर हो गए थे. पंद्रह-बीस दिन तक दफ्तर नहीं आ पाए थे. उन्हीं दिनों एक रोज मैं उनसे मिलने गया था. वे मन्नूजी के यहाँ हौजखास में थे. बिस्तर पर रजाई में लिपटे लेटे थे. उनका झाँक रहा चेहरा बेहद दुबला और कमजोर था. कमरे में चल रहे हीट कन्वेक्टर और रजाई में लिपटे होने के बाद भी उन्हें बहुत ठंड लग रही थी. किशन ने बताया कि वे बार-बार और रजाई उढ़ा देने के लिए कह रहे थे. इसी बीच और भी बहुत से लोग वहाँ पहुँच गए थे. राजेन्द्र जी को पता चला तो रजाई से खुद को बाहर निकालने के लिए कहा. वे इतने अशक्त थे कि खुद मुड़ भी नहीं सकते थे. किशन ने उनको उठाकर तकिया के सहारे बैठाने की कोशिश की, लेकिन उनकी गर्दन एक ओर को लुढ़क जा रही थी और वे तकिया पर सीधे टिक भी नहीं पा रहे थे. उनकी हालत देखते हुए उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती कर देने की बात हो रही थी. वहाँ मौजूद किसी ने मजाक किया, शायद अजित कुमार जी ने, कि अस्पताल में सुंदर नर्सें देखभाल करेंगी तो जल्दी ठीक हो जाएँगे. सुनकर राजेन्द्रजी बोले- बनारसीदास चतुर्वेदी का कहना था असली पाणिग्रहण तो अस्पताल में ही होता है जब नर्सें अगल-बगल होती हैं. ऐसी सघन उपस्थिति वाले व्यक्ति का जाना कितना हृदयविदारक है, समझा जा सकता है.         
राजेन्द्र जी इस दफ्तर और इस कमरे में 48 साल से बैठ रहे थे. मेरे पैदा होने और चलना, बोलना, पढ़ना-लिखना वगैरह सीखने के दौरान वे रोज इसी कमरे में आकर बैठ रहे थे. महत्त्वपूर्ण यह भी है कि वे उससे पहले ही अपने वे सारे उपन्यास आदि लिख चुके थे जिन्हें मैंने कॉलेज के दिनों में या उसके आसपास पढ़ा और जिन्हें पढ़कर भाषा और अनुभव का एक संस्कार हुआ था. वे सामने होते थे तो जैसे एक पूरा युग सामने होता था. कितने ही पुराने संदर्भ थे जिनके बारे में मैं उनसे पूछता था, या पूछ लेना चाहता था. ऐसे मौकों पर मेरी उत्सुकता के बरक्स उनकी सहजता के वे दृश्य हमेशा दिमाग में एक बिंब की तरह स्थिर रहेंगे, जब वे कहते राकेश कहता था.... और कोई अश्लील सी बात सुना देते. यह कहते हुए उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं होता था कि खुद मोहन राकेश मेरे लिए कितनी बड़ी छवि रहे हैं.

कॉलेज के दिनों में राजेन्द्र जी का उपन्यास शह और मात मुझे बहुत प्रिय था. (अभी उनकी टेबल और आलमारियों की खोजबीन करते हुए शह और मात की बही-खाते जैसे पन्नों पर लिखी जर्जर पांडुलिपि मिली.) उसकी भाषा की चर्चा मैं हर किसी से करता था. इतनी गहरी, चित्रात्मक, पारदर्शी भाषा लिखने वाले राजेन्द्रजी इधर पिछले एक-डेढ़ साल से ठीक से लिख नहीं पाते थे. संपादकीय बोलकर लिखवाते थे, और फिर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में संपादित करते थे. उनकी बातें और वाक्य संरचना बिखरे हुए होते थे, और कई बार समझ ही नहीं आते थे. उन्हें दुरुस्त करते हुए मैं उन्हें बात के किसी छूट गए बिंदु के बारे में बताता तो कहते अब आप ही कर लो जो करना है. और मैं जिनसे भाषा सीखी उन्हीं की भाषा और भावों को सुधारते हुए जीवन के इस अदभुत संयोग के बारे में सोचने लगता.       

Monday, December 2, 2013

उसूलों वाले रंजीत कपूर

महफिल सज चुकी है। गिलासें शराब डाले जाने का इंतजार कर रही हैं। रंजीत जी बिस्तर पर तकिया का टेक लिए बैठे हैं। अभी कुछ देर पहले गेस्ट हाउस में उनके कमरे में पहुँचे हम प्रायः एक श्रोता की भूमिका में हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अब दिल्ली में ही रहने का तय कर लिया है, और सिनेमा छोड़कर अब वे पूरी तरह थिएटर ही करेंगे। सिनेमा में बहुत सी प्रसिद्ध और सफल फिल्मों के पटकथा-लेखक होने और बतौर निर्देशक चिंटूजी बनाने के बाद उनका मन अब वहाँ नहीं लग रहा। सिनेमा की भीड़ में इतने साल खर्च करने के बाद भी कुछ है जो उन्हें रास नहीं आया। थोड़ा भावातिरेक में वे कहते हैं- थिएटर में मुझे इतना प्यार मिला है, इसलिए मैं अब पूरी तरह इसी में वापसी कर रहा हूँ। यही मेरी अपनी जगह है। मुझे याद आता है कि करीब साल भर पहले जब उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिला था, जो कि उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था, तो उन्होंने फोन पर पूछा था कि क्या उन्हें यह पुरस्कार लेना चाहिए, तो मैंने पुरस्कार की रकम जानने के बाद कहा था कि उन्हें यह ले लेना चाहिए। जानने वाले जानते हैं कि रंजीत कपूर के खाते में न वाजिब पुरस्कार हैं, न विदेश यात्राएँ; मध्यप्रदेश सरकार का कालिदास सम्मान उन्हें अब तक नहीं मिला है- लेकिन चालू मुहावरे में कहें तो वे हिंदी के एकमात्र नाट्य निर्देशक हैं जिनका नाम बिकता है। उनका नाम थिएटर के हाउसफुल होने की गारंटी है। कितने ही दर्शक हैं जिन्होंने उनका एक ही नाटक दर्जनों बार देखा है। वही रंजीत कपूर हमारे सामने बैठे मोबाइल पर किसी से बात कर रहे हैं। ....पेग इस बीच बन चुके हैं और चीयर्स के साथ सबने गिलास उठा लिए हैं। एक दोस्त गिलास को उठाकर उसे वहीं रखे स्टूल पर रखने जा रहे हैं। रंजीत जी टोकते हैं- चीयर्स का उसूल है कि गिलास उठा लिया है तो पहले उसका सिप लो, तभी उसे रखो!
रंजीत कपूर उसूलों वाले आदमी हैं। हालाँकि बहुत से लोगों की राय उनके बारे में इससे ठीक उलटी भी है। कि वे बोहेमियन और अविश्वसनीय हैं, कि पैसा लेकर भूल जाना उनकी फितरत में है, कि वादाखिलाफी और कहीं टिककर न रहना उनके स्वभाव में है, कि वे जरूरत से ज्यादा मूडी हैं,वगैरह। लेकिन ऐसी चर्चाओं के संदर्भ में मुझे रंजीत कपूर से कई दर्जा आगे के बोहमियन रहे हिंदी के एकांकीकार भुवनेश्वर के बारे में कवि शमशेर बहादुर सिंह द्वारा एक इंटरव्यू में बताया गया एक वाकया याद आता है। अपनी ऊटपटांग आदतों के लिए मशहूर भुवनेश्वर उन दिनों शमशेर के यहाँ इलाहाबाद में ही रहा करते थे। शमशेर जी कोई औसत गुजारे लायक नौकरी किया करते थे। उन्होंने बताया- एक बार मैंने देखा कि हर दूसरे-तीसरे दिन जेब में 6 पैसे कम हो रहे हैं। मैं समझ गया कि ये पैसे कम क्यों हो रहे हैं और कौन ले रहा है। हमेशा एक फिक्स एमाउंट से ज्यादा कभी कम नहीं हुआ। मैं जानता था कि भाँग की पुड़िया कम से कम 6 पैसे की मिलती है और भुवनेश्वर को उतने पैसे की जरूरत होती थी। .... उस व्यक्ति ने उतने ही लिए। मैंने वहीं उन्हें प्रणाम किया कि उसने उतना ही लिया....मिनिमम, जितने की उसकी जरूरत थी। इस इंटरव्यू में शमशेर जी बार-बार कहते हैं-भुवनेश्वर टूटे और गिरे, लेकिन अपनी डिग्निटी नहीं जाने दी। भुवनेश्वर के किरदार के बारे में थोड़ा-बहुत भी जानने वालों को उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष के प्रति शमशेर जी का यह इसरार थोड़ा अजीब याकि दिलचस्प लग सकता है, क्योंकि उनका जीवन प्रत्यक्षतः डिग्निटी के नियमों की बिल्कुल परवाह न करने वाला रहा है। लेकिन देखा गया है कि सच ठीक वैसा ही नहीं होता जैसा दिखता है, और ठीक यही बात रंजीत कपूर के बारे में भी लागू होती है। जब वे कहते हैं कि यह पैसा मैं कल ही लौटा दूँगा तो वास्तव में उनका इरादा उसे कल ही लौटा देने का होता है। लेकिन हकीकत में ऐसा अगर नहीं हो पाता तो इसकी वजह उनकी शख्सियत की वो शै है जो आभासों को असलियत की तरह बरतना चाहती है। रंजीत कपूर एक सच्चे गैरदुनियादार हैं। एक गैरदुनियादार संकल्पनावादी। उनके जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे उन्हें छुपाने की जरूरत पड़ती हो। चाहे वह उनकी एक से अधिक शादियों का मामला ही क्यों न हो। यही वजह है कि एक ऐसे वक्त में जब यथार्थ के दोटूक पन ने संकल्पनाओं को नष्ट कर दिया होजब ईएमआई का प्रबंधन ही जीवन की सफलता का पैमाना होऔर जीवन जीवन को बचाए रखने के लिए ही जिए जा रहे होंतब ये रंजीत कपूर ही हैं जो संसार को और संबंधों को एक क्लासिक आभा में देख पाते हैं; जहाँ जिंदगी जीने की एक नफासत हैऔर जहाँ समकालीन यथार्थ के टुच्चेपन से परे अपने भीतर के अँधेरे और उजाले की तनहाई में टहलते पात्र दिखाई देते हैं। सही है कि उनकी यही गैरदुनियादारी उन्हें बहुत-सी आत्म-छलनाओं में फँसाए रखती है, लेकिन यही वो चीज भी है जो उन्हें प्रेक्षागृह के मंच पर एक अपनी ही दुनिया रचने का लाजवाब हुनर देती है, जहाँ से वे हम रहें न हमसब ठाठ पड़ा रह जाएगा और आंटियों का तहखाना जैसी दुनियाएँ रचते हैं।
शराब के साथ बातचीत चल रही है कि दरवाजा खुलता है और एक शख्स नमूदार होता है। यह रंगकर्मी विजय शुक्ला हैं, जिनके बारे में उनके आने से पहले रंजीत कपूर हमें बता रहे थे। विजय शुक्ला हिंदी रंगमंच के सबसे प्रतिभाशाली चंद अभिनेताओं में से रहे हैं, पर कोई वजह रही कि बाद में उनका दिखना बंद हो गया। उन्हें बहुत पहले चेखव की दुनिया के बिल्कुल शुरुआती प्रदर्शनों में देखा था। यह नाटक अमेरिकी नाटककार नील साइमन द्वारा एंटन चेखव की आठ कहानियों को लेकर तैयार किया गया है। ये सिर्फ चंद कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि जीवन की वक्रोक्तियों, उसकी विडंबनाओं; वहाँ बनी रहने वाली बेआवाज टकराहटों, और तरह-तरह के नमूने पात्रों का एक संयोजन है। कहानियों की आंतरिक चेखवीयन व्यापकता को अक्षुण्ण रखते हुए ऐसा रोचक प्रस्तुति विधान रंजीत कपूर ही कर सकते हैं, जैसा उन्होंने इस प्रस्तुति में किया था। लेकिन यह भी है कि इस प्रस्तुति में सबसे ज्यादा जो याद रहता है वह है विजय शुक्ला का अभिनय। प्रस्तुति का सूत्रधार और एक कहानी में अपने ही दोस्त की बीवी पर डोरे डालता फ्लर्ट- जिसके पास एक नायाब आत्मविश्वास है और जिसे एक दिलचस्प मायूसी से होकर गुजरना पड़ता है। बाद में इस नाटक की अलग-अलग ग्रुपों द्वारा तैयार कई प्रस्तुतियाँ देखीं, पर कोई भी उस पहली प्रस्तुति के करीब भी नहीं पहुँच पाई।.... तो यही विजय शुक्ला कमरे में प्रकट हुए हैं। आधे-एक घंटे बाद उनकी कोई ट्रेन है, और वे रंजीत भाई के दिल्ली में होने की खबर सुनकर महज उनसे मिलने चले आए हैं। कल हिमाचल में उनकी कोई शूटिंग है, जहाँ उनका पहुँचना बहुत जरूरी है, और बस एक पेग लेकर वे निकल जाएँगे- ऐसा उन्होंने बताया। आनन-फानन में कमरे में उनके बैठने की भी जगह बनाई गई। बाकी लोग अब तक दो या तीन पेग के बाद सुरूर में हैं। समय का संज्ञान शिथिल होता जा रहा है। रंजीत जी ने कहीं से कुछ पन्ने निकाले हैं जिनमें कुछ ऐसे अशआर नोट हैं, जिनके कहने वालों की कोई पहचान नहीं है, पर उनकी कहन में कोई ऐसी नजाकत या अनूठापन है कि सब वाह-वाह कहने लगते हैं। सिगरेट के धुएँ और शराब की महक से भरे कमरे में मुझे कृष्णकल्पित की शराबी की सूक्तियाँ की पंक्ति याद आती है –सोचता है बढ़ई/ काश आरी से चीरी जा सकती शराब’; ‘सोचता है जुलहा/काश करघे पर बुनी जा सकती शराब। विजय शुक्ला इस बीच बैठने से पसरने की मुद्रा में आ गए हैं। वे बताते हैं कि इस ट्रेन के बाद भी एक ट्रेन है जो साढ़े ग्यारह बजे जाती है, और यह बगल में ही तो स्टेशन है।
तरह-तरह की आपस में गड्डमड्ड हो रही चर्चाएँ जारी हैं। किसी पुराने नाटक की चर्चा। रंजीत जी द्वारा उनके नाटक एक घोड़ा छह सवार के शो का जिक्र, जिसमें टिकटों की भारी मारामारी थी। मेरे द्वारा उनके नाटक एक मुसाफिर बेअसबाब’ के पहले हुए एक कर्टेन रेजर की उस लड़की पात्र की याद जो हर बात को रोते-रोते बोलती है, और दर्शक उसके रोने पर हँसते हैं। लेकिन काफी पहले हुआ वह नाटक इस महफिल में शायद किसी ने नहीं देखा। नए बने ग्रुप एंटरटेनर के कुछ सदस्य भी इस बज्म में मौजूद हैं। ये सभी अभिनेता हैं। रंजीत जी निर्देशित नाटक अफवाह में उनके अभिनय की चर्चा हो रही है। मैं भी अपनी राय रखता हूँ कि नाटक में माहौल बहुत अच्छी तरह बनाया गया था। नाटक के एक दृश्य में कुछ अवांछनीय पात्रों के आने को कुछ अन्य पात्र कमरे की खिड़की से देखते हैं, और इस क्रम में उन पात्रों की बदहवासी एक दिलचस्प दृश्य बनती है। इसी दृश्य को याद कर मैंने अपनी समीक्षा का शीर्षक दिया था-दृश्य के भीतर एक बाहर था। रंजीत जी शीर्षक की तारीफ करते हैं। हालाँकि उनका कहना है कि वे अपने नाटकों की समीक्षा कभी नहीं पढ़ते।
रंजीत जी को कुछ लोकधुनें याद आ गई हैं। वे गा रहे हैं। करीब दो दर्जन विदेशी नाटकों को भारतीय बनाकर शहरी ढांचे में मंच पर पेश कर चुके वे लोकधुनें भी उतनी ही तल्लीनता से गा रहे हैं। मुझे मालूम है कि उनके पिता एक नौटंकी कंपनी चलाते थे। मैं उनसे पूछता हूँ कि उन्होंने आज तक नौटंकी शैली में कुछ भी क्यों नहीं किया। वे कहते हैं कि नौटंकी शैली मुझे इतनी अपनी चीज लगती है कि उसमें कोई चुनौती ही नजर नहीं आती। रंजीत कपूर खुद किसी शैली में बँधने के पक्षधर भी नहीं हैं। किसी निश्चित शैली में काम करने वाले रंगकर्मियों को वे ऐसा संगीतकार मानते हैं जो सितार का एक ही तार बजाया करता है।
रंजीत कपूर की अपनी शख्सियत के सुर को समझना कोई आसान काम नहीं है। जबलपुर के एक थिएटर फेस्टिवल में वे भी आने वाले हैं। सब उनका इंतजार कर रहे हैं, पर वे लापता हैं। शहर में आ गए हैं, इसके आगे का किसी को कुछ नहीं मालूम। शहर उन्हें लील गया या वे खुद जंगल की ओर कूच कर गए- कैसे पता चले! अगले रोज वे प्रकट होते हैं तो खुलासा होता है कि उनके 26 साल पहले के कोई मित्र या प्रशंसक यह सुनने के बाद कि वे जबलपुर आ रहे हैं उन्हें स्टेशन से ही अपने साथ ले गए थे। फिर वे बताते हैं कि उनके इस अपहरण से पहले एक बार उनका बाकायदा अपहरण हो चुका है। कई बार लगता है कि उनकी जिंदगी की व्यवस्था शायद ऐसे ही बहुत से किस्सों से बनी है। ऐसा कोई न कोई किस्सा हमेशा ही उनके पास बना रहता है। आजकल भी वे एक ऐसे ही किस्से में काफी मनोयोग से मुब्तिला हैं। भारत रंग महोत्सव होने वाला है। लोगबाग महोत्सव में अपनी प्रस्तुतियाँ खपाने की जुगतों में रहा करते हैं, पर रंजीत कपूर का मनोरथ कुछ दूसरा है। वे एक बिहारी लड़के को, जो लक्ष्मीनगर के चौराहे पर लिट्टी-चोखे का ठेला लगाता है, महोत्सव के दौरान फूड कोर्ट में एक स्टाल दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं। उसके लिट्टी-चोखे का कसीदा पढ़ने के बाद वे उसके साथ हो रहे अन्याय के बारे में बताते हैं। पुलिसवाले उससे हजार रुपए माँग रहे हैं, जबकि बाकियों से वहाँ छह सौ रुपए ही लिए जाते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय थिएटर प्रस्तुतियों के गुणा-भाग में लगी आयोजक-मंडली से वे महज इतना ही तो कह रहे हैं कि बहावलपुर हाउस के परिसर में 15 दिन के लिए एक ठीहा इस गरीब को भी दे दो। उनकी गैरदुनियादारी यह नहीं जानती कि यह अदना-सा काम इस तनी हुई व्यवस्था में दरअसल कितना बड़ा है। (अंततः वे लड़के का कोई भी भला नहीं ही कर पाए.) उनसे जुड़े ऐसे बहुत से किस्से हैं जिन्हें संकलित किया जाए तो एक पूरी की पूरी पंचतंत्र तैयार हो सकती है।   
कमरे में सिगरेट का धुआँ भरा हुआ है। मैं सोचता हूँ- किन्हीं सुदूर जगहों से आए हम कुछ अजनबी आखिर किस निमित्त से यहाँ बैठे हैं? हमारे राग और हमारी ऊब के वे कौन से तार हैं जो हमें यहाँ चल रही विश्रृंखल बातों में रस प्रदान कर रहे हैं। मैं सोचता हूँ और अचानक लगता है कि रंजीत जी के व्यक्तित्व का असल सूत्र मेरे हाथ लग गया है। हम लोग अक्सर उन्हें हैरानी से देखते रहे हैं कि कैसे वे इतने अस्तव्यस्त होते हुए भी अपने काम को इतने सटीक ढंग से कर पाते हैं। अपनी जेब में रखे पान के बीड़े के साथ आखिर वे अनुशासन की उस पुड़िया को कहाँ छुपाकर रखते हैं कि बेहद हड़बड़ी में तैयार प्रस्तुतियाँ भी मंच पर बेहद बारीकी से तैयार किए गए माहौल के साथ प्रस्तुत होती हैं। मैंने महसूस किया कि इस कमरे की बातें अपने बिखरेपन के बावजूद उसी तरह काफी ठोस हैं जिस तरह किसी नाटक की भाववस्तु होती है। उस भाववस्तु के संप्रेषण के लिए सबसे पहले जरूरी है उसे जानना; और बहुत कम लोग हैं जो उसे इतनी ठोस तरह से जानते हैं जितना कि रंजीत कपूर। बिखरापन ऊपरी चीज है, पर कला का अपना तादात्म्य भीतर की। इस भीतर में कोई जुगाड़ काम नहीं करता, और न सिर्फ हुनरमंदी। भाववस्तु से इस तादात्म्य के लिए जीवन के प्रति एक सच्चाई की दरकार है। मुझे याद आता है महाश्वेता देवी के उपन्यास हजार चौरासी की माँ पर हुई एक प्रस्तुति को लेकर रंजीत जी ने थोड़ा चिढ़ते हुए कभी एक खरी बात कही थी कि अगर उपन्यास में कुछ दिखता है तो जाओ जहाँ संघर्ष हो रहा है। यहाँ उसका मंचन करके क्या दिखाना चाहते हो। कोई तो वजह है कि जीवन के साढ़े छह दशक गुजारने के बाद आज भी रंजीत कपूर एक फ्रीलांस रंगकर्मी हैं। जब वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र थेतभी फाइनल ईयर में उनके द्वारा निर्देशित नाटक वायजेक’ की प्रस्तुति को देखकर इब्राहीम अलकाजी ने उन्हें विद्यालय में प्राध्यापक हो जाने का ऑफर दिया था। पर उन्होंने इसे कबूल नहीं किया। उन्हें लगता था कि इस काम के लिए अभी वे पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं।
... ग्यारह से ऊपर हो चला है, लेकिन विजय शुक्ला के रवैये में ट्रेन पकड़ने को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही। याद दिलाने पर वे कहते हैं- गुरुजी अब यहीं रुक जाता हूँ, कल चला जाऊँगा। रंजीत जी थोड़ा हिचकिचाते हैं, फिर कहते हैं- चलो ठीक है। वे उनके खाने के बंदोबस्त को लेकर चिंतित हो उठे हैं। उनका अपना खाना पॉलीथिन में फॉइल में लिपटा वहीं रखा है।
रात ज्यादा हो चुकी है। महफिल धीरे-धीरे बर्खास्त होने लगी है। रंजीत जी को हरेक की फिक्र है। वे कार वालों से पूछ रहे हैं कि वे बिना कार वालों को उनके रास्ते पर कहाँ तक छोड़ सकते हैं। सबको उनकी फिक्र है, उन्हें सबकी फिक्र है। सहसा मैं चौंक जाता हूँ- अरे यही तो वह सूत्र है जिसकी उधेड़बुन में मैं इतनी देर से लगा हूँ- रंजीत कपूर नाम की शै को जानने का। 

Saturday, November 30, 2013

जन्नत में जम्हूरियत का घपला

अरसे बाद मुश्ताक काक ने दिल्ली में कोई प्रस्तुति की है। श्रीराम सेंटर रंगमंडल के लिए व्यंग्यकार शंकर पुणतांबेकर की रचना पर आधारित उनकी प्रस्तुति डेमोक्रेसी इन हेवनअच्छी-खासी रोचक है। एक नेता अपनी एक असिस्टेंट और चमचे के साथ एक रोड एक्सीडेंट में मारा जाता है। तीनों यमराज के दरबार में और फिर वहां कुछ घपला करके स्वर्ग पहुंच जाते हैं। इस तरह स्वर्ग के सात्विक माहौल में इन तीन घपलेबाजों की उपस्थिति और भावभंगिमाओं का सिलसिला देखने लायक है। अपनी फितरत के मारे तीनों अली, बली, कली में से कली अदा फेंककर कहती है- फिक्र मत करो सर, मैं चित्रगुप्त को ऐसा कांटा लगाऊंगी कि... उधर ऐंठा हुआ नेता अपनी आदत के अनुसार आरोप लगा रहा है कि यमराज कायर है, उसने पीछे से मारा। तीसरा चमचा बली है, जो नेता द्वारा अपना कान उमेठे जाते ही हांक लगाने लगता है- ओए चाबी बनवा लो, ताले बनवा लो।
हिंदी-व्यंग में पारलौकिक दुनिया में जा पहुंचने की फंतासी का इस्तेमाल खूब हुआ है। थिएटर को स्थिति-वैचित्र्य का यह कंट्रास्ट खूब रास भी आता है। हरिशंकर परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर से लेकर रेवतीशरण शर्मा की परमात्मा तक एक लंबी श्रृंखला है। मंच पर भगवान जी का लिबास पहले पात्रों की हकीकत के पात्रों से मुठभेड़ की दृश्यात्मकता में एक आसानी होती है। लेकिन यह दृश्यात्मकता अब एक रूढ़ि भी बन चुकी है। अपनी प्रस्तुति में मुश्ताक काक टाइम और स्पेस की अपनी समझ से इस रूढ़ि से निजात पाते हैं। नाटक के नेताजी मरने के बाद भी अपने वीआईपी रुतबे के नशे में हैं। उनके दोनों असिस्टेंटों द्वारा उन्हें बताए जाने पर कि वे मर चुके हैं वे झांक कर पृथ्वी पर देखते हैं और उनकी हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। शुरू का एक्सीडेंट का दृश्य इस लिहाज से अच्छे से तैयार किया गया है। बली कार चला रहा है, और नेता अली और कली किसी कार्टून फिल्म की तरह होंठों को गोल किए किस की मुद्रा में हिला रहे हैं। तभी ब्लैक आउट होता है और क्षणभर बाद रोशनी के आने पर तीनों अलग-अलग जगह जमीन पर गिरे पड़े हैं। मंच पर कुछेक ऊंचे-नीचे प्लेटफॉर्म और छत से लटकती चंद पट्टियां ही उसकी कुल सज्जा, जिसपर तीनों पात्र यमलोक से स्वर्ग की यात्रा के दौरान नदी, बस्तियाँ वगैरह पार करते हैं; जिस सफर में उन्हें तुलसीदास से लेकर नेहरू जी और बापू तक मिलते हैं।
चरित्रांकन के लिहाज से निर्देशक ने जो भी मेहनत की है, उसपर पूरी तरह अपने को खरा साबित किया है—श्रीराम रंगमंडल के पुराने अभिनेता श्रीकांत ने। नेता की भूमिका में उन्होंने अपनी सौ फीसदी प्रतिभा का इस्तेमाल किया है। नेता मुश्किल से ही कातर होता है, और उसकी ऐंठे हुई बेमुरव्वती की क्या रंगतें हैं! एक मौके पर भयानक गुस्से में उबल रहा वह कहता है- प्रचंड गालियाँ देने का मन हो रहा है, और फिर गाली-वमन के जरिए खुद को हल्का करने के लिए उसे पार्श्व में जाना पड़ता है। श्रीकांत यूं तो हर प्रस्तुति में ही अच्छा अभिनय करते हैं, पर इस बार उन्होंने पात्र के मूड को जिस खांटी कॉमिक रंगतों में पकड़ा है, वह बेजोड़ है। इसी क्रम में कुछ स्थितियाँ प्रस्तुति में अच्छी-खासी रंजक हैं। एक दृश्य में अन्यथा चमचा टाइप सेवक बली नेताजी की हरकतों से आजिज आकर उन्हें सड़कछाप गाली दे बैठता है। एक अन्य दृश्य में वह उन्हें कंधे पर लादे हुए है। इसी तरह एक मौके पर नाटक की एक पात्र गंगा मैया बिसलेरी पी रही है; और कली के झांसे में आए चित्रगुप्त राय जाहिर करते हैं कि धरती की ललनाओं के आगे स्वर्ग की अप्सराएं फेल हैं. उधर नेता को भी देवताओं के रहन-सहन को देखकर हैरानी है। वह कहता है- देवता तो मंदिर में रहते हैं. वो भी छोटे से आले में। बाकी जगह में तो पुजारी रहता है।
बली बने थोड़े भारी शरीर के अतुल जस्सी भी एक सहज अभिनेता हैं। मनोरम-शांत स्वर्ग में जम्बूद्वीप भारत नुमा लोकतंत्र का बिगुल फूंक दिए जाने के बाद वह पंजाबी लहजे में दिलचस्प भाषण देता है। ऐसे ही एक भाषण में नेता कहता है- लोकतंत्र के महानायक गब्बर सिंह ने कहा है- जो डर गया वो मर गया, वंदे लोकतंत्र!’
कुल मिलाकर अपनी निर्देशकीय अवधारणा, सुमन कुमार के नाट्यालेख, राजेश सिंह के संगीत संयोजन, और मुख्य तीनों पात्रों में- श्रीकांत मिश्रा, अतुल जस्सी और श्रुति मिश्रा के अभिनय में यह एक खासी दिलचस्प और रोचक प्रस्तुति है।

Tuesday, November 12, 2013

अनर्थ के जंगल में

रंगकर्मी हनु यादव एमेच्योर साधनों में गुरुगंभीर विषयों को मंच पर पेश करते रहे हैं। बीते दिनों उन्होंने वेटिंग फ़ॉर गोदो का मंचन किया। उनके काम और रंग-ढंग में एक बोहेमियन आत्मविश्वास बहुत साफ झलकता है। शायद इसी की बदौलत वे अपनी निपुणता को कई तरह की लापरवाहियों में गर्क किया करते हैं। वेटिंग फॉर गोदो की इस प्रस्तुति में जाने क्यों उन्होंने बैकड्राप के परदे को पूरी तरह हटवा दिया था। इससे ग्रीनरूम की तरफ खुलने वाले दरवाजे से आ रही रोशनियां और बैकस्टेज का नजारा गँवारू ढंग से मंच पर घुसपैठ किए हुए था। इस खीझ पैदा करने वाले मंजर में जब नाटक शुरू होता है तो गोगो या डीडी में से कोई एक आवश्यकता से कहीं बहुत देर तक अपना जूता उतारा करता है। इस तरह कुछ न किए जा सकने की व्यर्थता को दर्शाने वाली स्थिति एक चालू किस्म की नाटकीय युक्ति में तब्दील हुई रहती है। प्रस्तुति देखते हुए लगता नहीं कि उसके अभिनेताओं ने नाटक की मंशा को आत्मसात करने की कोई चेष्टा की है- इस वजह से उनके द्वारा बोले जा रहे संवाद स्थितियों के मंतव्य को सामने लाने के बजाय अक्सर प्रलाप जैसी शक्ल में नाटक की एब्सर्डिटी को एब्स्ट्रैक्ट में तब्दील करते मालूम देते हैं। यानी मंच पर निरंतर कुछ न कुछ किया तो जा रहा हैपर उससे निकलकर कुछ नहीं आ रहा।
यूं गोदो कुछ न निकलकर आने का ही नाटक है। उसके दोनों पात्र तरह-तरह से अपना समय काट रहे हैं। इसके लिए वे सोनेबहस करनेगाना गाने या आत्महत्या के बारे में सोचने जैसे कई काम करते हैं। इस तरह कहीं कुछ न हो रहे होने के व्यर्थताबोध के साथ मंच पर उपस्थित उन दोनों के संवाद पहले ही पर्याप्त बेतुके से लगते हैं। इस बेतुकेपन की सही से सम्हाल न करने पर उसका गड्डमड्ड होना लाजिम है। गोगो अपने हैट में झांकता हैडीडी अपने जूते में- पर कहीं कुछ नहीं है। फिर वे पोजो और उसके नौकर से मुलाकात के जरिए एक सामाजिकता में प्रवेश करते हैं। वह भी उतनी ही ऊटपटांग है। नौकर लकी हर समय बहुत सा सामान बैल की तरह अपने कंधे पर लटकाए खड़ा हैऔर हद दर्जे के गुलाम की तरह अपने मालिक के तमाम नाजायज आदेशों को पूरी तत्परता से पूरा कर रहा है। यहां तक कि थकान में उसके स्नायु जवाब देने लगते हैंतब भी। फिर वह इन बीच राह में मिले मेहमानों को खुश करने के लिए नाचता और सोचता भी है।
वेटिंग फॉर गोदो में एक तात्विक आशय बगैर गूढ़ हुए दिलचस्प नाटकीय ढंग से प्रस्तुत होता है। इधर हिंदी थिएटर में एब्सर्ड शैली को आशयहीनता में डिजाइन के (प्रायः) ऊटपटांग प्रयोग करने की तरकीब मान लिया गया है। जैसे कि सत्तर के दशक में यह बौद्धिकता के प्रदर्शन का एक जुमला होता था, जिसका बीएम शाह ने तब अपने नाटक त्रिशंकु में उसी जुमलेबाजी के ढंग से मजाक उड़ाया था। लेकिन हनु यादव की प्रस्तुति की समस्या ऐसी कुछ नहीं हैं। उसकी समस्या असामंजस्य से पैदा हुई है। उनके पात्र चरित्रों की स्टाइल में जाने के बजाय उन्हें कुछ अधिक नाटकीय बनाने की चेष्टा करते दिखते हैं। इस क्रम में संवादों की परस्परता में एक आवश्यक सामंजस्य या तादात्म्य जिस अर्थ का निर्माण करता है वह प्रस्तुति में अपनी धुरी से खिसका हुआ है। उधर निर्देशकीय में वेटिंग फॉर गोदो को हमारे समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थिति की बड़ी खूबसूरती से उजागर करने वाला बताया गया है। साथ ही निर्देशक ने यह भी कहा है कि प्रयोग के नाम पर दर्शकों के सामने कुछ भी ऊटपटांग करना उचित नहीं है। कहा जा सकता है कि अर्थहीनता एक जंगल है, जहां अनर्थ के जंगल की तुलना में कहीं ज्यादा रोशनी आती है। यह एक अभिनय कार्यशाला प्रस्तुति थी, जिसमें पात्रों की ऊर्जा यकीनन काफी दुरुस्त थी। आनंद पांडेय और अतुल ध्यानी जैसे युवा अभिनेताओं के साथ ही पोजो की भूमिका में कैलाश चंद जैसे कहीं प्रौढ़ वय के अभिनेता में भी इस ऊर्जा को देखा जा सकता था। लकी मंच पर दो थे। मुख्य लकी की भूमिका में राहुल सागर ठीक थे, हालाँकि उनका नाच उतना ऊटपटांग नहीं था जितना उसे होना चाहिए था. 

Saturday, October 19, 2013

अपने जैसे अजनबियों में

युवा रंगकर्मी हैप्पी रंजीत के लिखे और निर्देशित किए नाटक फैमिलियर स्ट्रेंजर का पुरुष अपनी लिवइन पार्टनर से संबंध को प्यार के बजाय ग्रेट फ्रेंडशिप’ कहता है। फिर एक रोज वह अपनी फिल्म में काम कर रही हीरोइन यानी एक अन्य स्त्री से पूछता है- तुम मेरे होने वाले बच्चे की मां बनोगी? उसके मुताबिक हर इंसान, जानवर, पेड़-पौधे की लाइफ का एक ही मकसद होता है- प्रोक्रिएशन। वह कहता है- मेरे लिए कुछ भी सही और गलत नहीं....एक रिश्ते के होते हुए अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए अट्रैक्शन आ गया है तो यह भी गलत है, पर यह तो हो गया है। इस पुरुष को हर आदर्श चीज से नफरत होती है, क्योंकि वो झूठ है और मुझे सच्चाई से प्यार है। उसका मानना है कि कोई रिश्ता जब तक काम कर रहा है तब तक ठीक, वरना उससे अलग हो जाना चाहिए। इसमें अच्छे-बुरे का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि जो मेरे लिए अच्छा है वह शायद दूसरे के नजरिए से बुरा हो। वह एक मुकम्मल आजादी का कायल है, जो तभी मिलती है जब आप किसी से जुड़े नहीं होते। ऐसी आजादी होगी तभी आप समाज के लिए कुछ कर पाएँगे. उसे एक अपने जैसी स्त्री नूरा मिलती है जो एक प्रसिद्ध लेखक है। वह उससे कहता है कि कोई स्त्री पुरुष को इसलिए रेप नहीं कर सकतीक्योंकि उसकी ऐसी कोई भी कोशिश पुरुष का सुख बन जाएगी क्योंकि पुरुष की स्त्री को लेकर कोई च्वाइस नहीं होती। इस पुरुष को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह जिसे अपने बच्चे की माँ बनाना चाह रहा है उसका अपना एक ब्वायफ्रेंड भी है। उसके मुताबिक उसे दूसरों की बीवियां अच्छी लगती हैं- यह उसका रावण सिन्ड्रॉम है, और मर्द रावण ही होता है। औरत चाहे तो वो कृष्ण बन जाता है। वरना ये सोसाइटी उसका गला घोंट देगी, जहां हर कोई राम कहलाना पसंद करता है- अंदर एक रावण को छिपाए। उसका यह भी कहना है कि चूंकि खुशी स्थायी नहीं हो सकती, इसलिए जब जो खुशी मिले उसे झपट लेना चाहिए।
पिछले सप्ताह एलटीजी प्रेक्षागृह में हुई यह प्रस्तुति देखते हुए सहज ही अनुमान होता है कि यह अपने यहां के संवेदनात्मक ढांचे से परे या आगे की कोई बात कर रही है। एशियाई ढंग की कोई भावुकता इसमें रत्ती भर दिखाई नहीं देती। यह पिछले एक-डेढ़ दशक में उभरी महानगरीय पीढ़ी की सोच और उत्तरआधुनिक समस्याओं का एक हिंगलिश बयान है। समूहों को लेकर बनाए गए सिद्धांतों के बरक्स व्यक्ति के सापेक्षिक सच की समस्या। यहां स्वतंत्रता की आकांक्षा भावनात्मक निर्भरता को नहीं जानती, और न ही सामाजिकता का कोई ढकोसला यहां चल सकता है। नाटक में न सिर्फ उसका विषय, बल्कि उसका मंचीय ढांचा भी खासा मौलिक है। वह बात पर इतना केंद्रित है कि बाहरी रूपरेखा की उसे आवश्यकता नहीं। होने को नाटक के आलेख में जंगल, होटल का कमरा, रेस्त्रां, फिल्म का सेट, फ्लैट का कमरा, बंगले का टैरेस गार्डन आदि बहुत कुछ है, पर वास्तव में मंच पर इन जगहों का कोई संकेत तक नहीं है। वहां सिर्फ एक सोफा कम बेड है और परदों के जरिए बनाया गया एक कमरे जैसा कुछ। इस ढांचे में यह चार पात्रों की एक काफी चुस्त प्रस्तुति है। इसमें किरदारों के नाम पर कुछ मूड दिखाई देते हैं, क्योंकि ये किसी ठेठ दुनियावी यथार्थ में नहीं बल्कि अपने भीतर के यथार्थों से घिरे हैं। मुख्य भूमिका में तुषार पांडेय के कमउम्र चेहरे-मोहरे का कच्चापन हालांकि थोड़ा अखरता है, पर उन्होंने एक ऐसे किरदार का काम ठीक से किया है जो अलग-अलग किस्म के मनुष्यों से बनी दुनिया में अपने निजत्व को भोगने की बेचैनी से घिरा है। लेकिन उनसे भी ज्यादा प्रभाव लेखिका बनीं नलिनी जोशी छोड़ती हैं। एक परिपक्व किरदार का ठोस आत्मविश्वास उनके पात्र को ज्यादा प्रभावी बनाता है। मंच प्रायः खाली है, पर एकाध दृश्यों की बहुत अच्छी योजना की गई है। एक ऐसे ही दृश्य में मुख्य पात्र एक जालीदार परदे में लिपटा हुआ है। प्रत्यक्षतः मंच पर एक लापरवाही-सी दिखने के बावजूद यह एक पर्याप्त गठी हुई प्रस्तुति है, जिसके संवादों में एक तार्किक वक्रोक्ति है। इसकी एक ही खामी है कि इसमें अपना समाज और परिवेश बहुत मामूली रूप से ही नजर आता है। हो सकता है कि इसके आलेख पर कुछ विदेशी नाटकों का प्रभाव रहा हो, पर अपने कुल विधान में प्रत्यक्षतः यह काफी ठोस प्रस्तुति है।

Monday, September 23, 2013

फैज के बारे में

फैज अहमद फैज की जन्मशताब्दी के प्रसंग से पिछले एक-डेढ़ सालों में उनपर केंद्रित कई नाटक खेले गए हैं; बावजूद इसके कि फैज के किरदार में कोई नाटकीय पहलू खास नजर नहीं आता। इन प्रस्तुतियों को देखने से जितना समझ आता है वह ये कि वे कोट-पैंट पहनने वाले और अमूमन सुलझी शख्सियत के इंसान थे। न कि दुनिया की बेढंगी चालों से बेजार पी-पी कर अपना कलेजा गर्क करने वाले मंटो की तरह के शख्स। फैज की शायरी भी- जितना मालूम देता है- उदभावनाओं की शायरी है। न वे मजाज हैं, न शमशेर...और भुवनेश्वर तो बिल्कुल ही नहीं; संयोग से जिनकी जन्म शताब्दियाँ भी इधर हाल में बगैर किसी संस्मरण के चुपचाप गुजरी हैं। अपनी रौ में सांसारिकता से बेखुद अदीबाना शख्सियत फैज की नहीं थी। वे एक चुस्त, चौकन्ने, जुझारू, प्रगतिशील और रोमांटिक तबियत के व्यक्ति थे। रामजी बाली लिखित, निर्देशित, अभिनीत प्रस्तुति मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग फैज के जीवन पर देखी कुछ पिछली प्रस्तुतियों से ज्यादा चुस्त मालूम देती है। उन्हें इस साल संगीत नाटक अकादेमी ने नाट्य लेखन के लिए उस्ताद बिस्मिल्ला खां युवा पुरस्कार से सम्मानित किया है। हिंदी में शख्सियत आधारित नाटक अमूमन बायोडाटा से निकले वृत्त नाटक होते हैं। खुद रामजी बाली ने कुछ अरसा पहले आवारा मसीहा की मार्फत शरतचंद्र को इसी शै में पेश किया था। नील साइमन ने जिस तरह चेखव की सिर्फ आठ कहानियों के जरिए उनके संवेदनात्मक विस्तार की एक पूरी रचनात्मक दुनिया आबाद की है वैसा किसी ने नहीं किया। बहरहाल, जो भी हो, रामजी बाली की यह प्रस्तुति हिंदी रंगमंच की बायोडाटा-परंपरा से किंचित अलग है। इसके फैज सीधे मैं शैली में मंच पर मौजूद हैं, जो अपने वालिदे मोहतरम की गुरबत में गुजरी जिंदगी के बारे में बताते हैं, और बताते हैं कि हमारी जिंदगी में एक माशूका भी है’; स्यालकोट और अमृतसर जिनकी परवरिश और रिहायश के शहर रहे कम्युनिस्ट घोषणापत्र पढ़ने से जिनके खयालात में क्रांतिकारी बदलाव आया; जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दिनों में सेना में कैप्टेन का पद संभाला। उनके ऐसा करने के पीछे दो तर्क थे। पहला, जापान और जर्मनी सरीखी फासिस्ट ताकतों को रोकने के लिए बरतानिया का समर्थनऔर दूसरा, सेना का हिस्सा बनकर वहां बगावत खड़ी करना। बाद में उन्हें इसी तकाजे से जेल भी जाना पड़ा। प्रत्यक्षतः ये सारा क्रम वृत्त नाटक जैसा ही है, पर वास्तव में प्रस्तुति एक कोलाज जैसी शक्ल में है, जिसमें तथ्यों को ढीले-ढाले ढंग से इकट्ठा करके शायरी के जरिए एक कलात्मक रंगत दी गई है। फैज की भूमिका में रामजी बाली उर्दू के मुश्किल लफ्जों की भी एक अच्छी लय बनाए रखते हैं। न सिर्फ इतना, बल्कि हारमोनियम संभाले राजेश पाठक का सटीक सुरों में गायन भी कुछ मौकों पर प्रस्तुति को काफी संयत किस्म की सांगीतिक आभा देता है। सारंगी और तबला वादन को एक साथ अंजाम देते अनिल मिश्रा के साथ उनकी जोड़ी न सिर्फ इस प्रस्तुति के बल्कि दिल्ली के पेशेवर रंगमंच के ज्यादातर संगीत पक्ष को अपने मजबूत कंधों पर संभाले हुए हैं। प्रस्तुति में शेष अभिनेताओं के लिए मंच पर करने को कुछ खास नहीं है। अभिनय के नाम पर उन्हें कुछ सीधे-सपाट संवाद बोलने हैं, जिनसे फैज के जीवन की एक सरसरी रूपरेखा बनती है; और इस काम को अपने कच्चेपन के बावजूद उन्होंनेतत्परता से अंजाम दिया है। अलबत्ता अपने तईं रामजी बाली ने प्रस्तुति को एक शैली में ढालने की कोशिश की है। वहां तमाम मसलों और मौकों के लिए शायरी का कोई टुकड़ा हाजिर है। इस तरह संगीत नाटक अकादेमी के अष्टावक्र हॉल में डेढ़ घंटे तक मंच पर मुस्तैदी बनी रहती है।
रामजी बाली दिल्ली के थिएटर परिदृश्य के काफी सक्रिय और अलग-अलग तरह का काम करने वाले रंगकर्मी हैं। उनकी एक तीन पात्रीय प्रस्तुति कोई बात चले भी अभी कुछ अरसा पहले ही मंचित हुई थी, जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता यशपाल शर्मा एक योग्य बीवी की तलाश में यहां-वहां की खाक छानते प्रौढ़ होने जा रहे बैचलर की भूमिका में थे। इसका निर्देशन और नाट्यालेख रामजी बाली का ही था, जिसमें परिहास के मुहावरे की एक अच्छी समझ दिखाई देती है। कई बार उनका हास्य साहित्यिकता में फंसता मालूम देता है, जब वे कुछ जुमलों से हास्य निकालने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनकी यह प्रस्तुति अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद हल्के-फुल्के हास्य का एक अच्छा उदाहरण कही जा सकती है; और ये दोनों प्रस्तुतियां रामजी के रंगकर्म के वैविध्य की।

Tuesday, September 10, 2013

बात पाँचवें वेद की

रंगकर्मी दंपती वीके और किरण की रंग शैली का प्रवाह देखने ही बनता है। अपनी नई प्रस्तुति रहस्य पंचम वेद का में उन्होंने नाटक के इतिहास और सिद्धांत को मंच पर पेश किया है, और वो भी बच्चो के एक खासे बड़े दल के साथ। रामजस स्कूल, पूसा रोड के छात्रों की इस प्रस्तुति में मंच पर जमा बच्चे नाटक खेलने के बारे में बात कर रहे हैं। उनका टीचर एक चीनी कहावत के बारे में बताता है कि सुनी हुई बातें भूल जाती हैं, देखी हुई याद रहती हैं, और की हुई समझ आती हैं। एक बच्चा बताता है कि उसके पुराने स्कूल के प्रिंसिपल नाटक के खिलाफ थे कि इससे पढ़ाई का हर्जा होता है। नाटक बनाम पढ़ाई के इस झगड़े में मूँछ लगाए बाप बेटे को डाँट रहा है, पर बेटा भी गुस्सैल तेवरों वाला है। उसके गुस्से में कहे ...पापा!’ के साथ सीन कट हो जाता है, और पात्रों का हुजूम एक कोरस के लिए प्रस्तुत हो जाता है : रंगमंच है दुनिया सारी/ हम सब केवल अभिनेता। पीछे स्क्रीन पर शेक्सपीयर की तस्वीर उभरी हुई है। शेक्सपीयर ने ही दुनिया को एक स्टेज बताया था, जहां बच्चा पैदा होते ही तरह-तरह के ड्रामे देखने लगता है। एक सास-बहू गोद में एक नवजात को लिए मंच पर नुमायाँ हुई हैं। सास कह रही है- बहू, इसके नैन-नक्श तो इतने अच्छे हैं, पर रंग तुमपर चला गया है। इसपर बहू भी कोई तानाकशी करती है. मां की गोद में अनुपस्थित नवजात टुकुर-टुकर अपनी मां और दादी के इस प्रपंच को देख रहा है- ऐसा दृश्यबोध बनता है। इसके बाद स्कूल न जाने का बहाना करती बच्ची, टीनेजर प्रेमी-प्रेमिका, नौकरी छोड़ दूंगाकी विद्रोही भंगिमा वाला युवा, शेयर बेचें या न बेचें- की चर्चा करते दुनियादार दंपती, और फिर दुनिया से रुखसत होने को तैयार बूढ़ी मां की संभाल करता बेटा.
इस शुरुआती भूमिका के बाद सवाल आता है कि ड्रामा क्यों और कब शुरू हुआ। तरह-तरह के कयास निकल कर आ रहे हैं। चूंकि शेक्सपीयर ने कहा है कि पूरी जिंदगी ही नाटक है, इसलिए नाटक भी तब शुरू हुआ होगा जब जिंदगी शुरू हुई। लिहाजा मंच पर जाने-पहचाने आदिवासी लिबास में कुछ पात्र आकर अजीबोगरीब गतिविधियां करते हैं। एक पात्र अपना लैपटॉप खोले नाटक के इतिहास की तफ्तीश कर रहा है। बताता है कि ग्रीक नाटक सबसे पुराना है, पर उससे भी नौ सौ साल पहले ऋग्वेद में भी नाटक की चर्चा की गई है. और आखिर में बात असल मुद्दे- यानी भरतमुनि के नाट्यशास्त्र- पर आती है। पात्र बताता है- चौथे वर्ण यानी शूद्रों के लिए वेद-पाठ प्रतिबंधित होने से ब्रह्मा जी ने इस पांचवें वेद की रचना की। इस तरह मंच पर पहले गेरुए पहनावे वाले ऋषि-मुनि और फिर कमल के फूल पर बैठे ब्रह्मा जी, चमकदार मुकुट लगाए इंद्रदेव और बड़ी-बड़ी मूंछों और काले कपड़ों वाले असुर दिखाई देते हैं। संक्षेप यह कि बगैर किसी निश्चित कहानी वाला वृत्तांत शैली का यह नाटक कई तरह के मानवीय व्यवहारों और इतिहास प्रसंगों आदि की मार्फत एक चुस्त दृश्य विधान में विन्यस्त है। मंच पर हर वक्त पात्रों की एक भारी-भरकम भीड़ नजर आती है। पर विषयवस्तु का फोकस इससे कहीं भी गड़बड़ाया हुआ नहीं लगता। डेढ़ घंटे में यह थिएटर का एक विहंगम इतिहास है, जिसमें तस्वीरों में यूनान का एंफी थिएटर है, और भाषा के विविध प्रयोग हैं। भरत मुनि बताते हैं- हे ब्राह्मणो, यह तब की बात है जब वैवस्त मनु के साथ त्रेता युग का आरंभ हुआ। बाद के दृश्यों में ब्रह्मा के बराबर में खड़े शिव इससे पहले तबले की रौद्र थापों पर नृत्य करते दिखाई दिए थे। इसी तरह नाट्यशास्त्र की गंभीर चर्चा के बीच हल्की-फुल्की किस्सागोई भी है। अपने ऊपर बैठे इंद्र को बौराया हाथी उठाकर पटक देता है; और ब्रह्मा जी इंद्र से कहते हैं- जाइए, सारे देवताओं को बोर्नविटा पिलाइए।

विषय खासा अकादमिक होने के बावजूद निर्देशकद्वय ने उसे बोझिल नहीं होने दिया है। प्रस्तुति में यथार्थ की सादगी और सहजता है, और कल्पना का चटकपन और सांगीतिकता भी। वीके और किरण का थिएटर विविधता के अवयवों से एक प्रवाह बनाता है। उनकी ऐसी प्रस्तुतियां वर्कशाप थिएटर का एक मॉडल कही जा सकती हैं, जहां अभिनेताओं के कच्चेपन को भी एक रंग-उपादान की तरह इस्तेमाल किया जाता है। और जहां झोल मुश्किल से ही दिखते हैं। बार-बार स्थितियों को ब्रेक किया जाता है, पर फिर भी कोई लड़खड़ाहट वहां नहीं होती।

Monday, August 12, 2013

दोहराव और रूपांतरण

शायद सरकारी धन पर निर्भरता के कारण या जिस भी वजह से हिंदी रंगमंच का परिदृश्य कई बार एक रस्मी कवायद जैसा लगता है। वही पुराने नाटक बार-बार खेले जाते हैं, जिनके निर्देशकीय में निर्देशकगण बताते हैं कि कैसे यह फलां नाटक आज के यथार्थ के लिए भी उतना ही समीचीन है। इस दोहराव के अलावा हिंदी रंगमंच का दूसरा प्रतिनिधि तत्त्व रूपांतरण है। कोई किसी कहानी का रूपांतरण कर रहा है, कोई उपन्यास का, कोई किसी पुराने नाटक का ही। पिछले दिनों देखी कुछ प्रस्तुतियां भी इसी सिलसिले में थीं। 
खूबसूरत बला :  राधेश्याम कथावाचक लिखित इस पारसी नाटक का यह ताजा संस्करण मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के सौजन्य से था। भोपाल के रवींद्र भवन में हेमा सिंह के निर्देशन में यह वहाँ के छात्रों की प्रस्तुति थी। संयोग से इसी नाटक की अतीत में देखी दो अन्य प्रस्तुतियाँ भी हेमा सिंह के निर्देशन में अलग-अलग छात्र समूहों की ही थीं। इस नाटक के कुल गठन में संप्रेषण की कोई बुनियादी खामी है। नाटक में कथानक का कोई ठोस याकि समेकित प्रभाव नहीं बन पाता; और अंत में सिवाय शम्सा के चरित्र के कुछ भी याद नहीं रह जाता। शम्सा एक नायाब किरदार है जिसे अपनी बुराइयों से पृथक अपना कोई वजूद कबूल नहीं, इसकी तुलना में वह मौत को गले लगाना पसंद करती है। ऐसा लगता है कि नाटक अपने ही रेटॉरिक में उलझ गया है; यानी कथानक के स्पष्ट विन्यास पर शैलीगत जुमलेबाजी कुछ ज्यादा हावी हो गई है। जो भी हो यह प्रस्तुति अभिनेताओं की ऊर्जा से कई अच्छे दृश्य बनाती है। कास्ट्यूम पर भी अच्छी मेहनत की गई है, जिसका रंग-बिरंगापन एक चाक्षुष असर पैदा करता है। हालांकि पारसी शैली में विशेष रूप से आवश्यक वाचिक की अपेक्षित विविधता यहां नहीं थी। सभी पात्र एक ही तरह से बोलते दिखाई देते हैं।
ए मिडसमर नाइट ड्रीम : मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के दीक्षांत समारोह की इस अंतिम प्रस्तुति के निर्देशक आलोक चटर्जी थे। यह एक सवा घंटे की साफ-सुथरी सारगर्भित प्रस्तुति थी। निर्देशक ने परिवेश का हिंदुस्तानीकरण करने के बजाय एक प्रायः खाली मंच पर कास्ट्यूम के जरिए अपनी कल्पना की ग्रीक शैली का एक परिवेश रचा है. पात्रों की शरारत, गफलत और फितरत से बनने वाली शेक्सपीयर की इस कॉमेडी का सबसे बेहतर हिस्सा वह है जिसमें कुछ कारीगर और मजदूर ड्यूक के सम्मान में नाटक खेलने जा रहे हैं। नाटक की प्रेमियों की गलतफहमी से पैदा हुई उलटबांसी आज कई शताब्दियों बाद पुरानी पड़ चुकी है, पर मजदूरों के भोलेपन का यह हिस्सा आज भी उतना ही ताजा है। दिक्कत यह है कि आलोक चटर्जी के मजदूर भी मजदूर कम कास्ट्यूम ड्रामा के यूनानी पात्र ज्यादा लगते हैं. ऐसे में उनकी छवि का खांटीपन और लिहाजा उसका हास्य मुकम्मल ढंग से स्थापित नहीं हो पाता. इसे एक नपी-तुली मैथड प्रस्तुति कह सकते हैं.
इस नाउम्मीदी की कायनात में : युवा निर्देशक दिलीप गुप्ता ने प्रेम भारद्वाज की कहानी पर एक प्रस्तुति पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में पेश की। इसका नायक हिंदी साहित्य की छोटी-सी दुनिया का एक आत्मपीड़ित प्रतिनिधि है। वह एक चेंप किस्म का प्रेमी है जो खुद को थप्पड़ मारने वाली प्रेमिका के यहां14 साल बाद कूरियरवाला बनकर जाता है और कहता है कि आपको मुझे नकारने का पूरा अधिकार है। फिर वह एक बलत्कृता से ब्याह करता है लेकिन उससे कभी कोई संबंध नहीं बनाता। इस नायक की हसरत रही है कि वह अपनी कविताओं से अपनी पहचान बनाएन कि पुरस्कारों से। लेकिन प्रकाशकों और आलोचकों सबने उसे छला है। लगातार अभावों में जीते इस नायक के अपने ही जैसे एक सीनियर और एक जूनियर दोस्त भी हैं। दिलीप गुप्ता ने हिंदी साहित्य की दो परिचित शख्सियतों की छवियों का एक गिमिक भी मंच पर रचा है। इनमें से एक की आवाज की स्वाभाविक नाटकीयता को उन्होंने एक अच्छी तरकीब की तरह इस्तेमाल किया है। स्पष्ट ही उनमें रंगमंचीय दृश्यात्मकता की अच्छी समझ है। हिंदी कहानियां आजकल जानबूझकर टेढ़ी होने की कोशिश करती हैं। दिलीप इसी टेढ़ेपन से मंच पर एक प्रयोग बनाते हैं। उनका निरीह नायक ऐ मेरे खुदा इस कायनात में एक कतरा जीवन मुझे भी नवाज देजैसा मुगलिया डायलाग बोलता है। नाटक के शुरू में छह पात्र खड़े हुए नायक की मौत पर शोकसभा कर रहे हैं। दृश्य में पीछे की ओर महानगरी ऊंची इमारतों के कटआउट्स लगे हैं और रोशनियां थोड़े उदास तरह से मंच पर अपने सायों के साथ गिर रही हैं। इसी तरह विवाह के दृश्य में कुछ लोग लालटेन लिए और मुंह को काले कपड़े से ढंके खड़े हैं। नायक के प्रेम के ऐलान के वक्त अमीर खुसरो की पंक्ति पर सूफियाना धुन बज उठती है। दिलीप गुप्ता में प्रतिभा की एक चमक दिखती है और साथ ही कई छोटे-मोटे व्यामोह भी। हिंदी थिएटर में इन्हीं व्यामोहों की वजह से स्थितियों को इंप्रेशनिज्म के टुकड़ों की तरह बरते जाने का चलन काफी बढ़ गया है।     

Saturday, June 22, 2013

युद्ध के विरोध में ब्रह्मचर्य

वरिष्ठ नाट्य निर्देशक वामन केंद्रे लिखित और निर्देशित प्रस्तुति नो सेक्स प्लीज एक काल्पनिक कथावस्तु पर आधारित प्रहसन है। एक राजा है जो युद्ध का प्रणेता है। दर्शक शुरू के दृश्यों में उसके द्वारा लड़े गए युद्धों पर उसका हास्यजनक संभाषण सुनते हैं, जिसमें वह हर चौराहे पर युद्ध देवता के पुतले खड़े कर देने का आह्वान करता है और अपने सैनिकों से कहता है- घाव तुम झेलोगे, वेदना हम झेलेंगे; खून तुम्हारा निकलेगा, आँसू हमारे। लेकिन चूँकि युद्ध हमेशा ही विभीषिका को जन्म देता है, जिसकी शिकार बनती हैं स्त्रियाँ. नगर की स्त्रियाँ तय करती हैं कि अब वे ऐसा नहीं होने देंगी; और संगठित गृहणियाँ और गणिकाएँ मिलकर पुरुषों से कह देती हैं- नो सेक्स प्लीज।
नाटक का कथासूत्र एरिस्टोफेनस के लिखे एक प्राचीन ग्रीक प्रहसन से लिया गया है; ऐसा छोटा  प्रहसन जिसे प्रसिद्ध ग्रीक त्रासदियों के मध्य कॉमिक रिलीफ के तौर पर पेश किया जाता था। इसे पूरी लंबाई के नाटक में तब्दील करते हुए वामन केंद्रे ने दृश्यात्मकता के एक पारंपरिक मुहावरे में आबद्ध किया है. उनके पात्र मंच पर चटक रंग वाले कास्ट्यूम में नजर आते हैं। उनकी देहगतियों में एक लय और लास्य है। इस तरह यह ऐसा शैलीबद्ध दृश्य बनता है जिसे आप एक जैसेपन के बावजूद देर तक देखते रहते हैं। इस दृश्य को अरसे बाद किसी नाटक में दिखाई दिए लाइवसंगीत का ठोस समर्थन प्राप्त है। सीधे-सीधे संवादों को खुद वामन केंद्रे द्वारा ही तैयार इस संगीत के जरिए ऐसी गीतात्मक रंगत दी गई है कि बहना अब तू न आंसू बहाना जैसे पंक्ति एक छोटे-मोटे कोरस में तब्दील हुई रहती है.
बावजूद इसके कि नाटक के कथ्य में कोई ठोस उत्सुकता या वास्तविक द्वंद्व नहीं है, प्रस्तुति दर्शकों को कई तरह की दृश्य योजनाओं के जरिए बाँधे रखती है. निर्देशक कथ्य के एक सीधे-सरल अदना से सिरे को एक झंझावाती आयोजन में बदल देते हैं. शरीर की ख्वाहिश सिर्फ हास्य का विषय नहीं है। हास्य की दो-चार स्थितियों के बाद पुरुष इसे लेकर दबंग हो उठा है- पत्नी को उसकी औकात बता देने पर आमादा। ऐसे में स्त्रियाँ थाली को बेलन से पीट रही हैं; उनकी घंटियों की सामूहिक ध्वनियों ने मंच को घेर लिया है। यह एक समुदाय के गुस्से की रंगमंचीय व्यंजना है; एक हल्की-फुल्की कहानी का ठोस दृश्यात्मक संस्कार है। ठेठ वामन केंद्रे शैली का दृश्य, जहाँ मंच पर हर चीज एक शास्त्रीय अनुशासन में बरती जाती दिखाई देती है। वे लंबे संवाद, जिनमें नैरेटिव का झोल साफ दिखाई देता है, भी पात्रगण पूरे इतमीनान और साफ-सुथरे ढंग से अंजाम दे रहे हैं। पात्रों की यह संलग्नता एक कमजोर दृश्य में ग्लूकोज की तरह का काम करती है।
हालाँकि नाटक के आलेख की कुछ खामियाँ भी प्रस्तुति में साफ दिखाई देती हैं। एक अच्छे प्रहसन के लिहाज से बात के सिरों को ठीक से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई है। कई मौकों पर उसमें ऐसा स्वच्छंदतावाद है कि राजा के आदेश देते ही एक आधुनिक यंत्र पर बीसवीं सदी की युद्ध-विभीषिकाएँ दिखाई जाने लगती हैं, वहीं ऐसा सायासपन भी कि उसकी पात्र हम जननी हैं, निर्मिति हमारा धर्म है, भविष्य को उजाड़ होते हम नहीं देख सकतीं जैसा संवाद बोलती हैं। वैसे इस लिहाज से कुछ अच्छी स्थितियाँ भी प्रस्तुति में हैं। एक मौके पर पति को झाँसा देने के लिए सास और बहू मिल गई हैं। पति के अंतरंग होने की हर कोशिश के वक्त दाएँ सिरे पर लेटी सास टेर लगाती है-अरे बेटा, खाना खा लिया क्या या अरे बहू, पानी तो पी ले, आदि। सास के स्वर में नाटकीयता का एक अच्छा लहजा है।
अपनी शैली में यह प्रस्तुति किसी ऑपेरा की तरह है। ऑपेरा में कथानक एक सांगीतिक भावबोध के रूप में व्यक्त होता है। यहाँ भी प्रस्तुति पात्रों की अलग से कोई पहचान नहीं बनाती, बल्कि वे सब एक समूह दृश्य का हिस्सा हैं, जिसे कई विधियों से पर्याप्त चाक्षुष और गीतिमय बनाया गया है। कुछ वर्ष पहले अपनी प्रस्तुति जानेमन से हिंदी रंग-समाज में कीर्ति अर्जित करने वाले वामन केंद्रे की इस प्रस्तुति में भी मंच पर चूक या झोल या दृश्य के अंतराल कम ही दिखते हैं। इस तरह अपनी निरंतरता में वे एक लंबा-सा दृश्य मंच पर खींचते हैं, जिससे बाहर आने के मौके दर्शक के लिए ज्यादा नहीं होते। कुछ मौकों पर लंबे उत्सुकताविहीन संवादों की एकरसता या ढीलेढाले नाटकीय मनोरथ वाली दृश्य संरचना जैसी खामियाँ इस लंबे दृश्य में आसानी से खप जाती हैं।
मुंबई की नाट्य संस्था रंगपीठ की इस बिल्कुल नई हिंदी प्रस्तुति का यह पहला प्रदर्शन था, जिसे संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार समारोह के तहत श्रीराम सेंटर में आयोजित किया गया। रंगमंच के क्षेत्र में इस साल वामन केंद्रे और त्रिपुरारी शर्मा को संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।