Tuesday, December 4, 2012

पूंछ हिलाने के पहलुओं पर नाटक


हनु यादव दिल्ली के पुराने रंगकर्मी हैं। वे बीच-बीच में दिखते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। करीब दो-ढाई दशक पहले उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध की लंबी कहानी 'विपात्र' का श्रीराम सेंटर बेसमेंट में मंचन किया था। हिंदी अकादमी के सौजन्य से पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में उनके निर्देशन में उनके पंचम ग्रुप की यह प्रस्तुति अरसे बाद फिर देखने को मिली। कहानीपन के निबाह के लिहाज से विपात्र एक गरिष्ठ किस्म का कथ्य है। इसके एक दफ्तर में काम करने वाले पात्र रोजमर्रा के वास्तविक सवालों पर बौद्धिक किस्म की चर्चा करते रहते हैं। इस चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा है कि 'हमने अपने स्वार्थों के लिए अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'। इसी बात को कहानी में कई तरह से कहा गया है। जितने भी पहलू इस विषय के हो सकते हैं उन्हें खंगाला गया है। उसका एक पात्र कहता है कि हर आदमी के पूंछ हिलाने के अलग-अलग तरीके होते हैं। फर्क इतना ही होता है कि कुछ लोग अपने आत्मसम्मान के प्रदर्शन के लिए अलग तरह से पूंछ हिलाते हैं। प्रस्तुति के संवाद कुछ इस तरह के हैं- 'कोई व्यक्तिबद्ध वेदना का उदात्तीकरण भले ही कर ले, पर उसकी मूल ग्रंथि तो बनी ही रहती है'; 'नपुंसक क्रोध उनमें होता है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'; 'व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति ही प्रधान उद्देश्य है'आदि। कहानी में दरमियानी फासलोंऔर छोटे होटल में चाय पीने में संतुष्टि हासिल करने में निहित रोमांटिसिज्म की भी चर्चा की गई है। दिलचस्प ढंग से हनु यादव ने इस गद्य में से भी कई किस्म के दृश्य निकाल लिए हैं। इस क्रम में कहानी में प्रसंगवश आई एक स्त्री और चायवाला और उसकी घरवाली मंच पर दिखाई देते हैं। इनके अलावा मूल रूप से दो ही दृश्य प्रस्तुति में हैं। एक में चर्चा करते तीन दफ्तरी, और दूसरे में एक बैठकी। पुराने दिनों की बैठकबाजी के इस दृश्य में अलग-अलग हैसियतों के लोग शामिल हैं। ऊपर से लगने वाले ठहाकों के भीतर एक पूरा समाजशास्त्र काम कर रहा है। हनु यादव इसी समाजशास्त्र में से कुछ रंजक छवियां निकालते हैं। वास्तव में बैठकी में दिखने वाला एक मुखिया किस्म का इंसान सबको निर्देशित कर रहा है। उसके साथ शर्त लगाने वाला एक शख्स एक किलो रसगुल्ले खाएगा। इसके लिए मंच पर बाकायदा रसगुल्ले मंगाए गए हैं। रसगुल्ले वास्तव में हैं, पर उनकी रकम संकेत में चुकाई जाती है। कुल मिलाकर बात का सटीक ढांचा तो नहीं पर उसका मंतव्य प्रस्तुति में दिखाई देता है : खुद को बचाए रखने की फिक्र में अपने सेल्फ और अपनी मनुष्यता से समझौता करते और इस बोध से जूझते पात्र। कहानी में मुक्तिबोध बुद्धिजीवियों की स्वार्थपरता को दिखाते हैं।
विषय की संजीदगी को देखते हुए बैठकी वाला दृश्य कुछ ज्यादा चटपटा हो गया है। बाकी स्थितियां इस लिहाज से कहीं ज्यादा संतुलित हैं। एकरसता को तोड़ने में रोशनी का भी कुछ मौकों पर अच्छा इस्तेमाल किया गया है। याद आता है कि धूसर रंगों में फैली उस पुरानी लंबी प्रस्तुति की तुलना में यह कहीं ज्यादा संक्षिप्त- सारगर्भित और अभिव्यक्तिपूर्ण थी। मंच पर झोला लटकाए, बीड़ी पीते और अपनी आंतरिकता से जूझते किरदार में हनु यादव का चेहरा-मोहरा और भावभंगिमा मानो मुक्तिबोध के प्रसिद्ध पोर्टेट की छवि को धारण किए हुए था। वह छवि जिसमें जमाने भर की फिक्र करते एक बौद्धिक को अपने लिए महज कुछ बीड़ियां ही चाहिए होती थीं।


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