Monday, December 24, 2012

बचा रहने वाला काम


जीवन में कई तरह के लोग मिलते हैं. ज्यादातर अपनी निजी जरूरतों-हसरतों के प्रश्न से जूझते. लेकिन कुछ दिन पहले  दफ्तर में मिले सुमित की समस्या यह थी कि आज के इतने पतित हो गए सामाजिक हालात में जीवन कैसे जिया जाए. कि सारा माहौल इतना संवेदनहीन और विवेकशून्यता से भरा मालूम देता है कि आपका सारा जानना-समझना-पढ़ना-सोचना आपको कुंठा के अलावा कुछ और नहीं देता. मैंने ठीक-ठीक सुमित का दृष्टिकोण जानना चाहा तो उसने मुझे एक घटना सुनाई. एक दलित लड़की के साथ एक दबंग जाति के आठ लड़कों ने बलात्कार किया. मामला थाने पहुंचा, तो पुलिस ने लड़की की मेडिकल जांच कराई. जांच रिपोर्ट में कहा गया कि लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, लिहाजा एफआईआर दर्ज नहीं की गई. लेकिन इसके कुछ ही रोज में ऐसा हुआ कि लड़की से हुए कुकर्म की खुद बलात्कारियों द्वारा बनाई गई विडियो क्लिप सार्वजनिक हो गई. उसकी सीडी और एमएमएस जब बहुतों के पास पहुंच गए तो इस प्रत्यक्ष सबूत के दबाव में पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए बाध्य होना पड़ा. पर न्याय की गुहार के इस प्राथमिक चरण तक पहुंचने तक लड़की इतना कुछ झेल चुकी थी कि उसने आत्महत्या कर ली. सुमित ने इस घटना पर अपने आसपास के लोगों से मिली कुछ प्रतिक्रियाओं के बारे में भी बताया. एक बंदे ने उससे कहा कि 'भई लड़की माल तो बढ़िया थी'. वीडियो क्लिप देख चुके एक दूसरे शख्स ने बताया कि वारदात को देख कर वह इतना उत्तेजित हुआ कि डेढ़ महीने बाद बीवी के पास जाने की जरूरत महसूस हुई. 
सुमित के यह बताने पर मुझे भी अपनी एक नौकरी के दौरान की एक घटना याद आई. उस दफ्तर में काम करने वाली एक लड़की का वहीं काम करने वाले एक व्यक्ति से अफेय़र था. शायद उनके बीच झगड़ा हुआ या पता नहीं क्या कि उस शख्स ने अपने अंतरंग यौन क्षणों को चोरी-छिपे फिल्मा कर उसका वीडियो क्लिप सार्वजनिक कर दिया. देखने वालों ने बताया कि वह क्लिप इस कुशलता से बनाया गया था कि पुरुष का चेहरा उसमें नहीं दिख रहा था. लेकिन सबको पता था कि यह किसकी करतूत है. घटना के बाद लड़की कई दिनों तक दफ्तर में नहीं दिखी. फिर बुझे हुए चेहरे के साथ वह दफ्तर आने लगी. मैं उसकी मनःस्थिति के बारे में सोचता तो भीतर से हिल जाता. कभी विश्वास और वजूद पर ऐसा ही आघात झेलकर राजा भरथरी एक बड़े कवि हो गए थे. यह दुर्योग था कि इस त्रासदी को आकार देने वाला शख्स ठीक मेरे सामने बैठता था. मैंने पाया कि इस घटना के बाद भी वह दफ्तर का एक सामान्य नागरिक था. लोग पहले की तरह ही उसके साथ बातचीत और हंसी-ठट्ठे में शरीक होते. और मैं सोचता था कि मुझे क्या करना चाहिए. अंततः अपनी कायरता और दुनियादारी में शायद चेहरे से जाहिर होती नफरत के अलावा मैं कुछ नहीं कर पाया.
सुमित ने एक और घटना बताई. उसके गांव के एक दबंग की गांव की एक गरीब मुसलमान औरत पर कुदृष्टि अंततः उसके गर्भवती होने के निष्कर्ष तक पहुंची. लड़की की मां को कुछ नहीं सूझा तो अंततः उसने उसकी शादी कर दी, जो गर्भ की असलियत सामने आने पर जल्द ही टूट गई. अब वह स्त्री अपने जर्जर दीन-हीन जीवन और बच्चे के साथ गांव में रहती है. और सुमित के मुताबिक उसकी जिंदगी का सबसे दारुण पक्ष यह है कि वह औरत इन हालात तक क्यों पहुंची इस बारे में उसके अपने कोई अहसास नहीं हैं. उसका सवाल था कि ऐसे हालात में जहां लोग अपने प्रति होने वाले अन्याय तक को लेकर उदासीन हों- आखिर इस पढ़ाई-लिखाई, ज्ञान-संवेदना को लेकर क्या करें!
सुमित एक सरकारी स्कूल में अध्यापक है, जहां उसके मुताबिक आम जीवन स्तर को देखते हुए तन्ख्वाहें बहुत ज्यादा हैं, पर फिर भी अध्यापक लोग कुछ करना या अपने को कुछ बेहतर बनाने के कतई इच्छुक नहीं हैं. उनकी बोलचाल की भाषा का स्तर ऐसा है कि दिक्कत होने लगती है.
मैंने सुमित से कहा कि ज्ञान अपने में ही दिक्कत की चीज है. अमूमन ज्ञान को जीवन की क्षुद्रताओं से मनुष्य की आजादी का रास्ता समझा जाता है. इन क्षुद्रताओं से बरी हो चुका इंसान जब सच को देख पाता है तो उसकी असली परेशानियां खड़ी होती हैं. डॉक्टर फ्रेंकेस्टीन के मॉन्स्टर को भी शिक्षित होने के बाद ही अपनी विडंबना का अहसास हुआ था. लेकिन इस सच की समझ से बचने का कोई रास्ता नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस पर जर्मनी ने अधिकार कर लिया था, और प्रतिरोध के बहुत सीमित रास्ते बचे थे, तब वहां फ्रेंच रेजिस्टेंस मूवमेंट ने जन्म लिया था. यानी हर नागरिक जहां, जितना और जैसा भी प्रतिरोध हो सके, करता था. मैंने सुमित से कहा कि जीवन इतना विराट है कि तमाम निराशा के बावजूद कोई न कोई काम आपके लिए बचा रहता है. स्कूलों का स्तर चाहे कितना भी खराब हो, दो-चार बच्चे काम के निकल आते हैं. उनपर ठीक से मेहनत करो. उनमें अपने होने का इलहाम और अपने काम को ठीक से करने की प्रतिबद्धता अगर आ पाए तो यह चीज जरूर आपको संतोष देगी.  

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