Friday, November 16, 2012

लड़की जो वायलिन हो गई


इंद्रियों से संचालित होने वाले शरीर को एक वस्तु की तरह बरतो तो वह एक दिलचस्प शै बन जाता है। आप खड़े-खड़े धड़ाम से गिर रहे हैं, पर चोट लगने का कोई भय नहीं। कोई कहीं भी छू रहा है कोई मायने नहीं। गुदगुदी होती है तो एक जैविक खिलखिलाहट निकलती है। अचानक एक शख्स बेतरतीब ढंग से कांपने लगता है। यानी शरीर अपनी फितरत में कुछ क्रियाएं करता है, पर वह इंद्रियबोझिल शख्सियत से बरी होकर एक स्वयंसक्षम इकाई बन चुका है। आध्यात्म की विदेह-अवस्था के जैसी ही मानो यह व्यक्तित्व-मुक्ति की कोई दशा है, जो एशियाइयों के वश की चीज नहीं। सामाजिक वर्जनाओं का बंधापन खुद को खुद से परे रखकर बरतने की मुक्ति तक जाने नहीं देता। यह तो पश्चिमी मानस है जो जान गया है कि शरीर को इतना तूल मत दो कि इस शरीर के भीतर रहने वाला मनुष्य उसका बंधक बन जाए।    
कुछ रोज पहले दिल्ली आर्ट फेस्टिवल के तहत श्रीराम सेंटर में हुई हंगारियन प्रस्तुति 'एग शैल' शरीर की उन्मुक्त क्षमताओं का एक नायाब कोलाज थी, जिसके बारे में बताया गया कि वह 'वह हमारी दैनिक चर्याओं की प्राकृतिक भाषा में संबंध को बगैर शब्दों के परिभाषित करती है.' 
मंच पर वास्तविक बत्तख जितनी ही ऊंची ढेर सारी बत्तखें रखी हुई हैं। दाईं ओर आगे दो स्त्रियां, बाईं ओर पीछे तीन पुरुष। अचानक पुरुष लड़ते हुए गुत्थमगुत्था होने लगते हैं और स्त्रियां हल्के-हल्के थिरक रही हैं। फिर मारापीटी करते तीनों एक लड़की को उठा लेते हैं। लड़की वायलिन बन गई है। वे उससे खिलवाड़ करते हुए यहां-वहां उसके शरीर को किसी वायलिन की लय में छेड़ रहे और गुदगुदी कर रहे हैं। लड़की मछली की तरह बेहाल हो रही है। इसी बीच दूसरी लड़की उसके मुंह में एक अंडा ठूंस देती है। मुंह में अंडा ठूंसे हाथ-पांव मारती लड़की और उजड्ड भंगिमाओं में तीनों बंदे और बत्तखें। लड़की इस  लाजवाब सर्रियल दृश्य से छूटकर भाग खड़ी होती है। अंडा उसके मुंह में वैसे ही ठुंसा है। वह एक पुरुष का 'लिप किस' लेते हुए अंडा उसके मुंह में पहुंचा देती है। इस तरह बारी-बारी से अंडा सभी पात्रों के मुंह में पहुंचता है। इसी बीच नर्सरी राइम जैसे स्वर मंच पर गूंजने लगे हैं। पात्रगण गूंजती स्वर लहरियों को बेलौस आकार दे रहे हैं। थिरकते-लहराते शरीर, ब्रेक डांस की रोबोटीय लय। लड़की ने एक बत्तख को माइक की तरह उठा लिया है। एक अन्य स्थिति में अगल-बगल कुर्सियों पर बैठे स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से सटी बाजुओं को रगड़ को आग जलाते हैं। उन्होंने कोई चीज वहां पहले से लगाई हुई है। वे सिगरेट पी रहे हैं। फिर होंठ से होंठ सटाकर वे मुंह में भरा धुआं बाकियों के मुंह में शिफ्ट कर रहे हैं। बीच-बीच में वे बत्तखों को अलग-अलग जगहों पर और अलग-अलग क्रम में रखकर दृश्य में परिवर्तन ला रहे हैं। दाएं सिरे पर एक मचान नुमा है। उसपर अधलेटी लड़की पैर की उंगलियों में जलती हुई सिगरेट दबाए है। पूरी कुशलता से वह नीचे खड़े तीनों पुरुषों के पास कश लेने के लिए पैर को ले जाती है। एक अन्य स्थिति में लड़का कुत्ता हो गया है। वह जीभ निकाले है। लड़की उसे पुचकार रही है। मंच पर एक तेज पंजाबी गीत बजने लगा है- 'नाल रहेगी जोगी के तैनू जोगन होना पै जाउगा'. सब इसपर अपने अपने ढंग से थिरक रहे हैं। एक पुरुष ने अजीबोगरीब ढंग से बहुत-सी बत्तखें उठा ली हैं। उसका चेहरा बत्तखों के बीच छिप गया है। कहीं से दो बड़े-बड़े अंडे इस बीच मंच पर चले आए हैं। दूसरी लड़की ने उन्हें अपने वक्ष की जगह पर ठूंस लिया है। पहले वाली लड़की को दो लोग बहुत ही तेज झुला रहे हैं। इस झुलाने में लाल रंग का उसका कास्ट्यूम हवा मे बुरी तरह लहरा गया है। शरीर उतनी जगह से उघड़ गया है। झुलाई जाती लड़की मानो अपनी ही बदहवासी का आनंद ले रही है। एक अन्य स्थिति में वह ऊंचे मचान से किसी लकड़ी की तरह नीचे गिरती है, जहां खड़े तीन बंदे उसे लपक लेते हैं। मंच पर एक वायलिन वादक आ गया है। उसके स्वरों के मुतल्लिक सारी गतियां धीमी होने लगी हैं। लड़की तीनों पुरुषों के कंधों और सिरों पर से होती हुई आगे बढ़ रही है। एक पुरुष जैसे ही मुक्त होता है, आगे जा लगता है। इस तरह उसका सिरों पर से गुजरने का यह सफर वायलिन के स्वरों के समांतर देर तक चलता है। अंतिम स्थितियों में वे पांचों अपनी-अपनी कुर्सियां बदलने का खेल एक ग्राफिकल लय में खेलते हैं। 
प्रस्तुति के निर्देशक का नाम जोल्टॉन है। इसकी खास बात उसमें निहित सुघड़ता, सुंदरता, जोश और आवेग को बताया गया है। अभिनेताओं की बहुस्तरीय ऊर्जा के बगैर ऐसी प्रस्तुति आकार नहीं ले सकती। वह खुद भी बहुत से स्तरों पर चलती है। उसमें हर अभिनेता मंच पर निरंतर कुछ न कुछ कर रहा है। अगर दाएं सिरे पर पुरुष नाच रहा है, तो बाईं ओर लड़की अपने बालों  को फैलाने और उलझाने में मशगूल है। दृश्य का यह ढांचा किसी प्रचलित अनुशासन से ऊपर है।

Saturday, November 10, 2012

बेगानी गलियों में दौड़ते शहर का गीत

युवा रंगकर्मी लोकेश जैन ने रंगकर्म का एक अलग ही मुहावरा विकसित किया है। इस मुहावरे में कोई कहानी नहीं होती, पर बहुत से चरित्रों के माध्यम से एक परिस्थिति को दिखाया जाता है। लोकेश धीरे-धीरे इस परिस्थिति की एक लय बनाते हैं, जो कथाहीनता के बावजूद दर्शकों को बांधे रखती है। यह लय कुछ इस किस्म की है कि इसमें यथार्थ और रूमानियत एक साथ शरीक दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए मंच पर जीवन के तलछट का कोई दृश्य चल रहा है कि पीछे से किसी पुरानी फिल्मी मेलोडी के स्वर सुनाई देते हैं। अपनी नई प्रस्तुति 'हमें नाज है' में लोकेश ने इसी शैली में पुरानी दिल्ली के गरीब-गुरबा के जीवन को विषय बनाया है। 
मंच पर बिल्कुल पीछे स्ट्रीट लाइट का एक खंबा खड़ा है, जिसपर एक गमला लटका है। वहीं नीचे प्रोपराइटर जमालू भाई का कंगला टी स्टाल है। टोपी लगाए व्यस्त जमालू के पास पड़ी बेंच पर छोटा जमालू भी बैठा रहता है। थोड़ी देर बाद केले वाली आती है, फिर गुदड़ी खाला, सुघड़ी आपा। किनारे पर दीन-हीन दशा में एक भिखारी भी बैठा है। उधार की चाय पीने वाला, झगड़ते हुए बच्चे, बोझा उठाने वाला आदि किरदार और मुनिया-पतरू की इश्किया लबझब वगैरह भी इस सतत दृश्य में विन्यस्त हैं। रात-बिरात अपने मालिक की झिड़कियां सुनता हुआ चौकीदार है, जिसे अपनी बिटिया का गौना करना है, खेती के बढ़ रहे खर्चों का हिसाब-किताब बैठाना है। एक भिखारिन है, जो गंगा में आई बाढ़ की कोई कहानी सुनाती रहती है। जमालू चाचा बंटवारे का वो वृत्तांत सुनाता है जिसके गड़बड़झाले में उसकी अपनी हवेली कस्टोडियन के कब्जे में चली गई। ऐसी कई कहानियां प्रस्तुति में दृश्य दर दृश्य पेश आती हैं। ये दृश्य अर्थव्यवस्था के विद्रूप में स्थानीयता की रंगतें लिए हुए हैं। वस्तुतः यह एक जर्जर हो रही स्थानीयता है, जिसे लोकेश अपने किसी स्मृत्याभास और रूमान के साथ नत्थी करते हुए रंगमंचीय छवियों में तब्दील करते हैं। 
दृश्य खुलते ही मंच पर कंबलों में निश्चेष्ट बहुत से लोग पड़े हुए हैं। कुछ सेकेंड की स्थिरता के बाद वे धीरे-धीरे उठते हैं और 'अनजानी बेगानी सी गलियों में' दौड़ते शहर का गीत गाते हैं। ठंड के मौसम में रात को सोने के लिए रजाई 20 रुपए और कंबल 10 रुपए किराए पर मिलता है। एक ठिठुरता उघारे बदन शख्स प्लास्टिक की पन्नी लिए दिखाई देता है। कांपती आवाज में वह अपना सपना बता रहा है- गर्म गद्दा और रजाई, जो ठंड को हड्डियों में घुसने नहीं देंगे। सूरज की किरन तो सुबह ही आएगी, और गर्मी देगी...सलीमगढ़ की दीवार के पीछे।..नहीने के पांच..खाने के लिए बीस...कम से कम सौ रुपए कमाने होंगे।...सपने ले लो सपने...। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ता है।
लेकिन यह बीहड़-बेजार जिंदगी सुबह फिर अपने ढर्रे पर लौटती है। अपनी रागात्मकता अपनी चुहुल के उन्हीं टटपुंजिया किस्सों के साथ। लंबा-सा झोला टांगे एक बाबा आता है जो सबमें बताशे बांटता है। एक चूरन बादाम खीरा बेचने वाला आता है। बैकग्राउंड से गाना बजता है- मोहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती। सारे पात्र अपनी कंगलई पर मस्त होकर नाच रहे हैं। लोकेश जैन इस मंजर में जल्दी-जल्दी समाज-व्यवस्था की बहुत सी तस्वीरें पैबस्त करते हैं। बेघर औरतों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन की कार्यकर्ता दृश्य में नमूदार होती है। वह मोबाइल पर अपने किसी उलझे संबंध को लेकर अंग्रेजी में तुर्श है और एक भीषण यथार्थ में एक नई खुराफात की तरह आ पहुंची है। अपने में ही हैरान-परेशान। इसी दरम्यान रह-रह कर दृश्य में दिखती एक बुरके वाली औरत अचानक अपना बुरका उठा देती है। सभी देखते हैं किसी साइको के फेंके तेजाब से झुलसा उसका वीभत्स चेहरा। जिंदगियों को इतना दुष्कर बनाता यह साइको कौन है? लोकेश जैन के मुताबिक यह बाजार है, जहां खो गई हैं खुशियां और बंद हो गई हैं सांसें। 
थिएटर ग्रुप जमघट और मंडला की इस प्रस्तुति के अभिनेता प्रायः पुरानी दिल्ली के गली-कूचों में रहने वाले युवा हैं। लोकेश जैन उन्हें ऐसे पात्रों में तब्दील करते हैं जिनके असलीपन में थोड़ा कैरिकेचर का पुट है। ये किरदार जिंदगी से ऊबे हुए भी हैं और उसमें डूबे हुए भी। उनके भीषण यथार्थ में ये कैरिकेचर देखने वाले के लिए एक रिलीफ पैदा करता है। कई दृश्यों में हिमांशु बी जोशी की प्रकाश योजना भी अलग से दिखाई देती है। लाल रोशनी में मृत्यु सरीखी उदासी मंच को घेरे है। यह एक 'कंपनी जैसे बन गए देश के लोकतंत्र' की उदासी है, जिसे श्रीराम सेंटर में पिछले सप्ताह हुई यह प्रस्तुति जीना यहां मरना यहां के नियति-भाव से संलग्न करती है।

Monday, November 5, 2012

असभ्यता की सड़क पर


दिल्ली में एक सड़क, जिसे बीआरटी कॉरिडोर कहा जाता है, पिछले सालों में लगातार चर्चा और विवादों में रही है. कई साल पहले जब इसपर काम शुरू हुआ था तब मेरे जैसे बहुत से लोग उधर से गुजरते हुए देखते थे कि आखिर यह हो क्या रहा है. बीच की आधी सड़क को ट्रैफिक से खाली करवा कर उसे सीमेंटेड किया जा रहा था, उसपर छोटे-छोटे फुटपाथ और पटरियां वगैरह बनाए जा रहे थे. और इधर पूरी सड़क का ट्रैफिक आधी सड़क में इन कारगुजारियों को निहारता हुआ फंसा रहता. फिर पता चला कि सड़क को सीमेंटेड करने और फुटपाथ बनाने में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, और इस तरह सरकार ने सार्वजनिक यातायात को व्यवस्थित करने की दिशा में एक नया झंडा गाड़ दिया है. उधर लगभग नियमित रूप से अखबारों और चैनलों में बीआरटी कॉरिडोर पर ट्रैफिक जाम की खबरें भी दिखाई देने लगीं. सरकार की उपलब्धि जनता को बेहाल किए हुए थी और लोग समझने लगे कि बीआरटी खुद में ही कोई राक्षसी नीति है.
उसी दौरान एक स्वैच्छिक संस्था इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनिबिलिटी के सौजन्य से हुए एक स्लाइड शो में  इसकी अवधारणा के तमाम पहलू जानने को मिले. उस शो में ऑस्ट्रिया से आए एक प्रोफेसर एक स्क्रीन पर दिख रही तस्वीरों के समांतर अपनी कमेंट्री के जरिए दुनिया के कई शहरों में यातायात के परिदृश्य और उसमें बीआरटी की भूमिका को स्पष्ट कर रहे थे. बीआरटी यानी बस रैपिड ट्रांजिट अर्थात एक ऐसी व्यवधानरहित सड़क जिसपर सिर्फ बसों को ही चलने की अनुमति होती है. दुनियाभर में विकास के अमेरिकी मॉडल का अनुसरण करने के कारण कारों की तादाद तमाम शहरों को आक्रांत किए हुए है. कार की वजह से बहुत कम लोग सड़क पर बहुत ज्यादा जगह घेरे रहते हैं. इस तरह बढ़ते ट्रैफिक को प्रवहमान बनाए रखने के लिए फ्लाईओवर बनाए गए. फ्लाईओवर यानी कंक्रीट का ऐसा ढांचा, जो उस मंजर को विकराल, असहज और असुंदर बनाता है. शो में कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाई गईं, जिनमें दक्षिण कोरिया के सियोल शहर में बीआरटी की सफलता के बाद कई फ्लाईओवरों को तोड़ दिया गया. तोड़ने के बाद वाली तस्वीरों में वहां एक बगीचा, उसमें लगे फूल और खुलापन था. शो में मेट्रो ट्रेन की भी चर्चा हुई, जिसके सबसे बड़े अरबों रुपए की लागत वाले निर्लज्ज प्रोजेक्ट चालीस फीसदी भूखी-नंगी आबादी वाले हमारे देश में इन दिनों बड़े पैमाने पर चल रहे हैं. उन्होंने दिखाया कि कैसे किसी मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए एक यात्री को या तो काफी नीचे सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं, या काफी ऊपर चढ़नी पड़ती हैं, और अगर यह सारा समय जोड़ लें तो अंततः उसके लिए वक्त की कोई ज्यादा बचत नहीं हो पाती. फिर मेट्रो की यह सीमा भी है कि एक शहर की बसावट में हर जगह तक उसकी पहुंच नहीं हो सकती. उसकी तुलना में बीआरटी सड़क के लिए सिर्फ इतना ही करना होता है कि उसपर खुलने वाली तमाम उप-सड़कों को निषिद्ध करना होता है और उसे अधिकतम सिग्नल फ्री बनाना होता है. इस पद्धति में कोई तकनीकी तामझाम नहीं. यात्री सीधे सड़क पर बने बस स्टाप पर आता है, बस पकड़ता है और निर्बाध चल रही बस उसे एक लगभग निर्धारित समय में उसके गंतव्य पर पहुंचा देती है. शो में प्रोफेसर ने एक तस्वीर दिखाई जिसमें एक कार खड़ी थी. उन्होंने देख रहे लोगों से पूछा कि क्या इस तस्वीर में उन्हें कुछ असामान्य दिखाई दे रहा है. किसी ने भी हां नहीं कहा तो वे बोले- इसका मतलब है कि आपकी निगाह खुद में ही असामान्य हो चुकी है. उस निगाह में उस खाली जगह को देखने का बोध समाप्त हो चुका है, जो इस तस्वीर में कार से भरी हुई है. उन्होंने विएना में बीआरटी की सफलता के बाद उसके आसपास के रिहायशी इलाकों में बढ़े साइकिल के चलन, कारों से मुक्त प्राकृतिक स्पेस के इजाफे और नतीजतन प्रदूषण के स्तर में आई गिरावट को भी दिखाया.
लेकिन हमारे यहां बीआरटी के अंजाम कुछ अलग ही हुए. स्वैच्छिक संस्था से जुड़े एक मित्र ने मेरे इस विचार की पुष्टि की कि दिल्ली का बीआरटी दरअसल बीआरटी है ही नहीं. वह पूर्ववत सिग्नलों से युक्त एक सामान्य सड़क है, जिसे बसों के लिए सीमित करते ही बाकी सड़क पर दबाव बहुत बढ़ गया है, और बसों को भी कोई विशेष फायदा नहीं हुआ है. यह सड़क हमारी व्यवस्था के भ्रष्टाचार, मूर्खता, निरंकुशता और केऑस को समझने का एक बहुत अच्छा उदाहरण है. जब से यह बनी है तब से इसने लोगों को परेशान करने के अलावा भले ही कुछ न किया हो, पर व्यवस्था को व्यस्त बने रहने के लिए इसने एक वजह दे दी है. कभी उसपर जनहित याचिका होती है, कभी मुख्यमंत्री एक आधुनिक प्रणाली के बतौर उसके पक्ष में दलील देती हैं, कभी कोर्ट उसके स्टेटस को बहाल रखा जाए या नहीं इसपर अपना निर्णय सुनाती है. न्यूज चैनल उसपर खबर बनाते हैं और सड़क से कोई सीधा ताल्लुक न रखने वाला दर्शक इस खबर को अदालती निर्णय के पक्ष या विपक्ष के किसी सिरे से थाम लेता है. लब्बोलुबाब यह कि इस तरह एक व्यवस्था गतिशील बनी रहती है.... अभी कुछ रोज पहले दिल्ली में 20 और बीआरटी कॉरिडोर बनाने की घोषणा की गई है. इनका क्या स्वरूप होगा ये तो भगवान जाने, पर आम लोगों के लिए दी जाने वाली सब्सिडियां घटाने से जमा हुई रकम का एक हिस्सा इनपर जरूर खर्च हो जाएगा. उधर ट्रैफिक की समस्या को बढ़ाने वाली कारें फिर भी कम नहीं होंगी, क्योंकि वे तरक्की और समृद्धि की निशानी हैं.