Wednesday, October 31, 2012

दूर से तुगलक पास से तुगलक

फिरोजशाह कोटला में नाटक के मंच के कई खंड हैं। बाएं छोर पर आम जनता से जुड़ी स्थितियों के लिए छोटे-छोटे जीनों में बना प्लेटफॉर्म, फिर बादशाह का दरबार और कक्ष, फिर एक बस्ती, एक किला और उसकी बुर्जी; उसी से सटी एक ऊबड़खाबड़ जगह। यह इतना विस्तृत मंजर है कि किसी एक दृश्य के लिए दर्शक को बहुत ज्यादा गर्दन घुमानी पड़ती है, या बुर्जी पर एक वास्तविक पेड़ के करीब अपने सिपहसालार से बात कर रहा बादशाह किसी सुदूर छवि की तरह दिखाई देता है। यह प्रोसीनियम से एक अलग तरह का अनुभव है। यहां कोई छत नहीं है जहां से पात्र को फोकस में लेने वाला रोशनी का कोई स्पष्ट वृत्त बन सके। यहां रोशनियां थोड़ी दूर से आती हैं। दृश्य दर दृश्य किसी एक मंच को उजागर करतीं। आरके धींगरा ने कई मौकों पर अपनी प्रकाश योजना से अच्छे चाक्षुष असर पैदा किए हैं।  इब्राहीम अलकाजी के शब्दों में तुगलक एक ऐसा नाटक है जो 'विशद निरूपण' की मांग करता है, जिसमें उदाहरण के लिए उन्होंने बादशाह के अध्ययन कक्ष की किताबों से ठसाठस भरी ताख का भी जिक्र किया है। पर निर्देशक भानु भारती की प्रस्तुति के इस विस्तृत मंच पर विशद निरूपण का अर्थ बदल गया है। राजधानी के दिल्ली से दौलताबाद जाने के दृश्य के लिए सामने के पूरे विस्तार में पीछे की ओर बांसों के बने रास्ते पर देर तक सुनाई देते वाद्यस्वरों के बीच लोग जाते दिखते हैं। भानु भारती इस दूरस्थ मंच पर प्रवेश-प्रस्थान, अभिनेयता और वेशभूषा की गुणवत्ता से एक प्रभाव पैदा करते हैं। प्रस्तुति में माइक्रोफोन एक महत्त्वपूर्ण औजार है। लिहाजा दृश्य भले थोड़ा दूर हो पर वाचिक के न्यूनतम झोल नाटक के उस मूल तर्क को अक्षुण्ण रखते हैं जहां से नाटक तुगलक का तनाव बनता और एक ट्रैजेडी की ओर जाता दिखता है।
नाटक तुगलक अपने प्रोटागोनिस्ट के माध्यम से एक समाज का भी विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। उसके छल-कपट, उसकी आत्मदीनता और मक्कारियों का। जहां लाशों का भी कारोबार कर लिया जाता है और जहां मौत के खेल हमेशा चला ही करते हैं। एक मुल्क जहां कुछ भी सही नहीं है, उसे एक बादशाह अपने स्वयंभू फैसलों से दुरुस्त करने में लगा है। वो अपने आसपास की साजिशों से बाखबर है, अपने फैसलों के तमाम पक्षों और नतीजों के बारे में जानता है, उसके पास मुल्क को लेकर एक नजरिया है- पर फिर भी कोई चीज है जो उसे नाकामी की तरफ धकेलती है। वह क्या है? गिरीश कर्नाड इसका भी हल्का सा पता देते हैं। नाटक में दुनियादारी छोड़कर मोक्ष की फिक्र करने वाली हिंदू दार्शनिकता के कारण हकीकी तरक्की के इल्म इस्लाम को कबूल करने वाला वजीरे आजम नजीब अंततः इस नतीजे पर पहुंचता है कि 'सुनहरा दौर इस दुनिया में कभी कायम नहीं हो सकता। यहां है सिर्फ चंद लम्हे जो हम जी रहे हैं। बस, इन पर से हमारी गिरफ्त ढीली न पड़े।' कर्नाड शायद इसी बौद्धिक निष्कर्ष को उसमें निहित विरोधाभास और विडंबना के साथ कई तरह के पात्रों के माध्यम से एक तनावपूर्ण नाटकीयता में बांधते हैं। इस नाटकीयता में लगातार घटनाएं और साजिशें होती रहती हैं। अविश्वास का वैसा ही माहौल है जैसा समकालीन हिंदुस्तान में देखा जा सकता है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने आत्मविश्वास से लबरेज एक बादशाह के निराशा के गर्त तक पहुंचने की तमाम रंगतों का मंच पर अच्छा चित्रण किया है। एक दूसरा पात्र जो मंच पर अलग से नजर आता है, वह है धूर्त अजीज का। हत्या, चोरी, लूटमारी जैसे काम करने वाले इस पात्र को टीकम जोशी ने अपनी नियमित ऊर्जा से मंच पर पेश किया है। इसके अलावा सौतेली मां की भूमिका में हिमानी शिवपुरी, नजीब की भूमिका में रवि खानविल्कर एवं अन्य अभिनेताओं का अभिनय भी काफी अच्छा है। प्रस्तुति में आलेख के माहौल को बनाने में अम्बा सान्याल की वेशभूषा की भी खास भूमिका दिखाई देती है।
प्रस्तुति में दृश्य संरचना का भारीभरकम तामझाम होने के बावजूद निर्देशक भानु भारती ने चीजों को बिखरने नहीं दिया है। वे मंच के यथार्थवाद को उसके पूरे अनुशासन के साथ व्यवहार में लाए हैं। ज्यादा बारीकियों में उलझने के बजाय ऐसी ग्रैंड प्रस्तुति के लिए विशद निरूपण की यही नीति शायद उचित भी थी। उसके कई दृश्य अपने संयोजन में काफी भव्यता लिए हैं।

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