Wednesday, September 19, 2012

रोटी और पिज्जा


किसी नगर की किसी बस्ती की किसी इमारत की चौथी मंजिल के एक टू बेडरूम फ्लैट में एक परिवार अपनी धुंधली-सी हंसी-खुशी के साथ रहता था। सुबह होते ही घर के सदस्य इसे बनाए रखने की कोशिशों में जी-जान से जुट जाते। घर का पुरुष बच्चों को उनके ढीलेढालेपन और लापरवाही के लिए झिड़कियां देने लगता और मां रसोई का मोर्चा संभाल लेती। वो अपने सिद्धहस्त हाथों से जैम लगी ब्रेड या उबाली गई मैगी से बच्चों का टिफिन तैयार करती, और फिर दोपहर के खाने के लिए जल्दी-जल्दी रोटियां बेलने लगती। बच्चों के जाने के बाद पति-पत्नी स्वयं भी तैयार होकर अपने-अपने दफ्तरों के लिए कूच कर जाते। अरसे से यह सब कुछ इसी तरह चल रहा था। दफ्तर की ओर जाने वाली चार्टर्ड बस में पत्नी एक झपकी ले लेती और पति ट्रैफिक जाम में अपने दोपहिया पर फंसा कार लेने के बारे में सोचने लगता।
बच्चों की खुशी पिज्जा में थी। दोपहर को जब दोनों भाई-बहन स्कूल से लौटते तो उनका मन पिज्जा खाने को होता, पर उन्हें भिंडी या गोभी की सब्जी के साथ रोटियां खाकर रह जाना पड़ता। लेकिन एक रोज ऐसा हुआ कि स्कूल से लौटते ही भाई ने कभी अखबार के साथ आया एक पर्चा अपनी आलमारी से ढूंढकर निकाला। यह पर्चा पिज्जा की होम डिलीवरी के बारे में था। उसने बहन को अपनी जेब से निकाल कर दो सौ रुपए दिखाए जो उसे अंकगणित की किताब खरीदने के लिए दिए गए थे और जो किताब उसे उसके एक दोस्त से मुफ्त में मिल गई थी। दो सौ रुपए देखकर बहन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। जल्दी से पर्चे में नंबर देखकर पिज्जा वाले को फोन किया गया। कुछ ही देर बाद होम डिलीवरी आई और दो सौ में से 190 रुपए खर्च करके दोनों भाई-बहन ने उस दिन दोपहर के भोजन में बजाय रोटियों के पिज्जा खाया। पिज्जा खाने के बाद सवाल खड़ा हुआ कि अब रोटियों का क्या किया जाए। कूड़े में फेंकी तो मम्मी को पता चल जाएगा। नहीं फेंकीं तो मम्मी की बकवास कौन सुनेगा। सड़क के किनारे फेंकने गए तो बिल्डिंग का गार्ड देख सकता है। ऐसे में भाई को एक खयाल सूझा। वह घर की बालकोनी में आया। रोटी को लपेटा और गेंद की तरह जोर से थ्रो कर दिया। रोटी हवा में लहराने के बाद सामने वाली इमारत के दालान में जाकर गिरी। फिर दूसरी रोटी, फिर तीसरी ...सारे निशाने सही लग रहे थे, पर चौथी और छठी रोटी में चूक हुई और दोनों अपनी ही इमारत के अहाते में जा गिरीं।
शाम को लौटते वक्त मां को वे दोनों रोटियां जमीन पर पड़ी दिखाई दीं, जिनकी लोई को  पलोथन में लपेटकर उसने उन्हें आकार दिया था। रोटी सामान्य रोटी जैसी ही थी, पर उसमें कुछ ऐसा था कि उसने पहचान लिया कि ये तो उसकी अपनी ही बनाई रोटियां हैं। वह घर पहुंची और उसने बेटा, जो बड़ा था, की ओर भावशून्य ढंग से ताका। फिर उसने बताना शुरू किया- ''जब मैं बहुत छोटी थी तो गांव में मेरी परनानी रहती थीं। वे बहुत बूढ़ी होने के बावजूद चूल्हे पर अपनी रोटी खुद ही बनाती थीं। उनके दांत नहीं थे, इसलिए वे बेली हुई नहीं, थापी हुई मोटी रोटी बनाती थीं, ताकि चबाने में आसानी हो। लेकिन जब हम जाते तो वे हमारे लिए तवे पर पतली-पतली रोटियां बनातीं और आग पर उन्हें फुलातीं। वे जब आग को बढ़ाने के लिए लोहे की फुंकनी से फूंक मारतीं तो उनकी आंखों में धुएं की वजह से पानी भर जाता। मैं गौर से नानी का चेहरा देखा करती और सोचती कि नानी हमारी रोटी के लिए इतना कष्ट उठा रही हैं। गांव में मेरा मन जामुन और पेड़े खाने का करता, पर जब खाना परोसा जाता तो मैं रोटी खाने से इसलिए इनकार नहीं कर पाती थी कि मेरे सामने नानी का धुएं में फूंक मारता आंसुओं से भरा चेहरा घूमता रहता।''
मां की बात पूरी होते ही, तब तक घर में आ चुके, पिता ने बोलना शुरू किया- ''मेरे लड़कपन के दिनों में रोटी बनने की प्रक्रिया हमेशा ही चलती रहती थी। पहले गेंहूं खरीदने के लिए राशन की लाइन में लगना पड़ता था। साइकिल पर उसे लेकर घर आते। फिर अम्मां उसे धोती-सुखातीं और बीनतीं। मैं कंधे पर उसे चक्की से पिसवाकर लाता। मिट्टी का तेल लेने के लिए सुबह-सुबह डिपो पर लाइन लगाने जाता। पीपे में भर कर लाए गए मिट्टी के तेल से स्टोव में आग आती, और इस तरह रोटी बनने के सारे इंतजाम होते।''
उनके बोलने के बाद बेटे ने बोलना शुरू किया। वो बोला-''पिताजी, आप लोग रोटी के जिस सूक्ष्म यथार्थ की बात बता रहे हैं वह हमारे अनुभव का हिस्सा नहीं है। आटा गेंहूं से बनता है यह मुझे भी मालूम है। कई सौ टन गेंहूं बारिश में सड़ जाता है और कई करोड़ लोग इस देश में भूखे ही सोते हैं ये दोनों ही तथ्य भी हमें पता हैं, लेकिन हमने कभी भूख को करीब से नहीं देखा। आठवीं क्लास में मैंने हिंदी की किताब में 'पूस की रात' कहानी पढ़ी है, इसलिए मुझे पता है कि कभी ठंड के दिनों में नीलगाय नामक किसी जंतु से अपनी फसल की हिफाजत के लिए किसान खेत में ही सोया करते थे, पर मैने खुद कभी खेत को करीब से नहीं देखा। खेत हमारे लिए एक आभासी संदर्भ की तरह है।''
बेटे ने जब यह कहा तो पिता ने अपनी गिरेबान में झांक कर देखा। वहां उसे कुछ भी नजर नहीं आया।

No comments:

Post a Comment