Thursday, September 27, 2012

खो चुके रास्ते का एक सफर


टेनिसी विलियम्स ने नाटक 'कैमिनो रियल' 1953 में लिखा था. अमेरिका के जैफरी सीशेल के निर्देशन में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तीसरे वर्ष के छात्रों ने इसकी एक प्रस्तुति तैयार की, जिसके प्रदर्शन अभिमंच प्रेक्षागृह में इसी सप्ताह किए गए। नाटक में घटनाओं का कोई सिलसिला नहीं है, यथार्थवाद का कोई ढांचा नहीं है, पात्रों से कोई निश्चित तादात्म्य भी नहीं बन पाता। फिर यह नाटक क्या है? सीशेल के मुताबिक 'यह नाटक किसी अनिश्चित समय में बहुत सी अवास्तविक घटनाओं की एक महाकाव्यात्मक यात्रा है.' खुद टेनिसी विलियम्स ने इसके बारे में लिखा कि 'यह नाटक मेरे लिए किसी अन्य दुनिया, किसी भिन्न अस्तित्व की रचना जैसा प्रतीत होता है'. कैसी दुनिया? इसके लिए उन्होंने महाकाव्य 'डिवाइन कॉमेडी' लिखने वाले चौदहवीं सदी के इतालवी कवि दांते को उद्धृत किया। दांते के मुताबिक 'हमारे जीवन की यात्रा के बीचोबीच मैंने खुद को एक अंधेरे जंगल में पाया जहां सीधा रास्ता खो गया था.' निर्देशक जैफरी सीशेल के अनुसार, यदि यह नाटक डिवाइन कॉमेडी के प्रथम भाग 'इनफर्नो' (नरक) का प्रतिरूप है, तो इसमें दिखने वाला आम आदमी का किरदार उस शुरुआती अमेरिकी या रेड इंडियन जैसा है जो जिंदगी के असल रास्ते (कैमिनो रियल) पर जटिल सामाजिक बंजर (वेस्टलैंड) से मुठभेड़ करता है। प्रसंगवश यहां यह उल्लेख कर देना उचित होगा कि टीएस इलियट की रचना 'वेस्टलैंड', जिसमें खुद दांते से लेकर शेक्सपीयर, मिल्टन और प्राचीन संस्कृत मंत्रों की पंक्तियों तक को शामिल किया गया है, भी इस नाटक के जैसी ही ऊबड़खाबड़ संरचना वाली है। 
प्रस्तुति में सबसे महत्त्वपूर्ण उसका मंच ही है। यह आगे की ओर ढलवां लकड़ी का एक विशाल प्लेटफॉर्म है. ढलवां होने की वजह से काफी पीछे खड़ा पात्र भी इसपर स्पष्ट दिखाई देता है। इस ऊंचे प्लेटफॉर्म के किनारों पर कोई विंग्स नहीं हैं, लिहाजा दृश्य का विस्तार दोनों सिरों की नीचाई में भी पसरा हुआ है। दृश्य के कुछ आनुषंगिक विवरण यहां दिखाई देते हैं- नृत्यमुद्रा में कोई स्त्री, कोई गुजरता हुआ पात्र, आदि। नाटक का मंच किसी स्पेनिश शहर का ऐसा छोर है, जिसके चारों ओर निर्जन है और जहां छिटपुट कुछ आवागमन होता है। टेनिसी विलियम्स के मुताबिक यह मंच 'उस संसार और समय, जिसमें मैं रहता हूं, की मेरी धारणा से न रत्ती भर कम है न ज्यादा'
जो भी हो, इस सारे वृत्तांत के बावजूद प्रस्तुति दर्शकों के लिए अबूझ ही बनी रहती है। रह-रहकर स्थितियों के कुछ 'ब्लॉक्स' घटित हो रहे हैं, पर सब कुछ इतना यांत्रिक है कि घट रहे का कोई प्रभाव नहीं बन पाता।  हालांकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परंपरा के अनुसार स्टेज का बीच में खुलकर एक बड़ा सा गड्ढा बन जाना, ऊपर से एक मचान का लटकना जैसी कवायदें इस प्रस्तुति में भी भरपूर हैं। प्रस्तुति में कुछ स्थितियां दिखाई देती हैं- एक पात्र दूसरे पात्र को गोली मार देता है। दो अन्य पात्र कूड़ा ढोने वाली गाड़ी में मरे हुए पात्र को डालकर मंच से नीचे की ओर उड़ेल आते हैं। मचान नीचे आती है, उससे एक सीढ़ी जुड़ जाती है। वगैरह। उसमें एक पात्र दोन किहोते है, उसका नौकरनुमा सहयात्री सैंचो (जिसे हम हिंदी वाले सांको पांजा पढ़ते आए) है, बायरन है; लेकिन हिंदी के संसार के लिए ये पात्र अपनी छवियों में प्रायः अनजान ही हैं। ये बगैर भूमिका के अनुवाद कर दिए गए पात्र हैं। हालांकि इसके लिए रंगकर्मी विवेक मिश्र के अनुवाद को दोष देना गलत होगा। यह मूलतः प्रस्तुति की अवधारणा का दोष है, जो भाववस्तु के बजाय स्थितियों के चित्रण में उलझी है। इस तरह के अपरिचित परिवेश और परंपरा लेकिन इससे किंचित कम अमूर्त कथानक पर एक सफल प्रस्तुति की याद आती है- वीके निर्देशित इब्सन का 'पीयर जाइंट', जिसमें पूरी प्रस्तुति के दौरान एक अक्षुण्ण लय दर्शक को बांधे रखती है। नाटक देखते हुए यह तो समझ आता है कि यह यथार्थवाद की सीध का नाटक नहीं है। कि यह जीवन के बहुत से इंप्रेशंस की एक उतनी ही 'एब्सर्ड' व्यंजना है। लेकिन सिर्फ इतना समझ आना ही क्या पर्याप्त है! देखने वाला उसके साथ कुछ तादात्म्य बना पाए, इसका भी बंदोबस्त होना अच्छा रहता। 

Sunday, September 23, 2012

मंटो- एक कोलाज


हिंदी थिएटर मंटो की प्रगतिशील बोहेमियन छवि से बार-बार विमोहित होता है। अपनी बौद्धिक सीमा में वह इस छवि के रूमान पर मुग्ध हुआ रहता है। मोहन राकेश ने मंटो की कहानियों में जिस जुमलेबाजी को एक खास कमजोरी के तौर पर लक्ष्य किया था, हिंदी थिएटर उसे एक नाटकीय तत्त्व के तौर पर गदगद होकर इस्तेमाल करता है। लेकिन बीते सप्ताह सम्मुख प्रेक्षागृह में हुई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की प्रस्तुति 'दफा- 292' की विशेषता यह है कि मंटो की एक परिहासपूर्ण कहानी के जरिए उसमें इस रूमान से परे सरकने की कोशिश की गई है। युवा रंगकर्मी अनूप त्रिवेदी निर्देशित इस प्रस्तुति में कथ्य के तीन चरण हैं। पहला, मंटो और उनकी बीवी का संवाद; दूसरा, कहानी 'तीन खामोश औरतें'; तीसरा, मंटो पर मुकदमा और उपसंहार। इस सारे सिलसिले में मंटो अपने खयालात और हालात को अक्सर एकालाप में भी बयान करते नजर आते हैं। वे बताते हैं कि 'कम्युनिस्ट मुझपर फाहशनिगारी का इल्जाम लगाते हैं', कि 'कोई तकियाई हुई रंडी मेरे अफसाने का मौजूं बन सकती है', कि 'जैसे में खाना खाता हूं, गुसल करता हूं, सिगरेट पीता हूं, वैसे ही अफसाना लिखता हूं'. अनूप त्रिवेदी ने रोशनी के दो अलग-अलग वृत्तों में मंच पर दो मंटो पेश किए हैं. दो मंटो और दो ही उनकी बीवियां. यह चीज देर तक चलने वाले पति-पत्नी के चुहुलनुमा झगड़े की एकरसता को थोड़ा कम करती है। बगैर किसी शोर-शराबे के साफ-सुथरे दृश्यों में रोशनी के फोकस और छायाएं धीमे से एक प्रभाव बनाते हैं। इन दृश्यों में कुछ भी अनावश्यक नहीं है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर बैठी तीन औरतों के बातूनीपन की कहानी 'तीन खामोश औरतें' में एक तख्त मंच पर है और उसके किनारे पर एक लैंपपोस्ट खड़ा है। बाकी दृश्य ट्रेन के गुजरने के स्वर, गार्ड की सीटी वगैरह से बनता है। लेकिन असली चीज है चरित्र की छवि. अनूप त्रिवेदी में इसकी अच्छी सूझ है। पहली बातूनी औरत धाराप्रवाह बोले जा रही है, दूसरी उसे औचक सुन रही है। यह दूसरी वाली बीच-बीच में खों-खों करके थोड़ा विचित्र तरह से हंसती है। बाद में यह दूसरी वाली बोलना शुरू करती है तो अब तक अलग-थलग बैठी तीसरी वाली का भौंचक्का-सा उत्सुक चेहरा देखते ही बनता है। कुछ ही देर में तीसरी वाली शुरू हो जाती है, और इस बीच वहीं प्लेटफॉर्म पर सोने का उपक्रम कर रहा बंदा पहलू बदलता हुआ निरीह मुद्रा में रह-रह कर उन्हें देख रहा है। एक मौके पर वह पहली बातूनी औरत की बात सुनता हुआ अपनी बंडी उतार देता है। लेकिन औरत बोलने में इस कदर मशगूल है कि उसपर उघारे बदन की अशालीनता का असर भी कुछ देर बाद होता है। तब उसका हल्की सकपकाहट में नजरें फेर लेना जल्दी से घरेलू स्त्री की अच्छी छवि बनाता है। 
प्रस्तुति एक कोलाज की तरह है, जिसमें बाद में कुछ फुटपाथिये दुकानदार मंटो के मुकदमे की चर्चा करते हैं कि पता नहीं गिरे इंसानों को उठाने में उसे क्या मजा आता है! कि वो ऐसे अफसाने लिखता है जैसी बातों के मुतल्लिक सोचना भी अपने में संगीन जुर्म है। अनूप मंच पर वो स्पेस बनाते हैं जहां छोटे-मोटे किरदार भी गौर से दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इधर के दिनों में जिस तरह चीजों से ठुंसे हुए ऊटपटांग किस्म के नाटक होते रहे हैं, उनमें यह बिल्कुल अलग तरह की प्रस्तुति थी। पूरे दृश्य विधान में त्रुटियां या चूकें इसमें नहीं दिखाई देतीं। अनूप त्रिवेदी की पहचान अब तक मुख्यतः अभिनेता के तौर पर रही है, पर यह प्रस्तुति उनकी सुलझी हुई रंग-दृष्टि को सामने लाती है। विशेषत: दृश्य के कैनवास और उसमें चरित्रांकन से बनती छवियों को लेकर।
प्रस्तुति का एक दृश्य

Wednesday, September 19, 2012

रोटी और पिज्जा


किसी नगर की किसी बस्ती की किसी इमारत की चौथी मंजिल के एक टू बेडरूम फ्लैट में एक परिवार अपनी धुंधली-सी हंसी-खुशी के साथ रहता था। सुबह होते ही घर के सदस्य इसे बनाए रखने की कोशिशों में जी-जान से जुट जाते। घर का पुरुष बच्चों को उनके ढीलेढालेपन और लापरवाही के लिए झिड़कियां देने लगता और मां रसोई का मोर्चा संभाल लेती। वो अपने सिद्धहस्त हाथों से जैम लगी ब्रेड या उबाली गई मैगी से बच्चों का टिफिन तैयार करती, और फिर दोपहर के खाने के लिए जल्दी-जल्दी रोटियां बेलने लगती। बच्चों के जाने के बाद पति-पत्नी स्वयं भी तैयार होकर अपने-अपने दफ्तरों के लिए कूच कर जाते। अरसे से यह सब कुछ इसी तरह चल रहा था। दफ्तर की ओर जाने वाली चार्टर्ड बस में पत्नी एक झपकी ले लेती और पति ट्रैफिक जाम में अपने दोपहिया पर फंसा कार लेने के बारे में सोचने लगता।
बच्चों की खुशी पिज्जा में थी। दोपहर को जब दोनों भाई-बहन स्कूल से लौटते तो उनका मन पिज्जा खाने को होता, पर उन्हें भिंडी या गोभी की सब्जी के साथ रोटियां खाकर रह जाना पड़ता। लेकिन एक रोज ऐसा हुआ कि स्कूल से लौटते ही भाई ने कभी अखबार के साथ आया एक पर्चा अपनी आलमारी से ढूंढकर निकाला। यह पर्चा पिज्जा की होम डिलीवरी के बारे में था। उसने बहन को अपनी जेब से निकाल कर दो सौ रुपए दिखाए जो उसे अंकगणित की किताब खरीदने के लिए दिए गए थे और जो किताब उसे उसके एक दोस्त से मुफ्त में मिल गई थी। दो सौ रुपए देखकर बहन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। जल्दी से पर्चे में नंबर देखकर पिज्जा वाले को फोन किया गया। कुछ ही देर बाद होम डिलीवरी आई और दो सौ में से 190 रुपए खर्च करके दोनों भाई-बहन ने उस दिन दोपहर के भोजन में बजाय रोटियों के पिज्जा खाया। पिज्जा खाने के बाद सवाल खड़ा हुआ कि अब रोटियों का क्या किया जाए। कूड़े में फेंकी तो मम्मी को पता चल जाएगा। नहीं फेंकीं तो मम्मी की बकवास कौन सुनेगा। सड़क के किनारे फेंकने गए तो बिल्डिंग का गार्ड देख सकता है। ऐसे में भाई को एक खयाल सूझा। वह घर की बालकोनी में आया। रोटी को लपेटा और गेंद की तरह जोर से थ्रो कर दिया। रोटी हवा में लहराने के बाद सामने वाली इमारत के दालान में जाकर गिरी। फिर दूसरी रोटी, फिर तीसरी ...सारे निशाने सही लग रहे थे, पर चौथी और छठी रोटी में चूक हुई और दोनों अपनी ही इमारत के अहाते में जा गिरीं।
शाम को लौटते वक्त मां को वे दोनों रोटियां जमीन पर पड़ी दिखाई दीं, जिनकी लोई को  पलोथन में लपेटकर उसने उन्हें आकार दिया था। रोटी सामान्य रोटी जैसी ही थी, पर उसमें कुछ ऐसा था कि उसने पहचान लिया कि ये तो उसकी अपनी ही बनाई रोटियां हैं। वह घर पहुंची और उसने बेटा, जो बड़ा था, की ओर भावशून्य ढंग से ताका। फिर उसने बताना शुरू किया- ''जब मैं बहुत छोटी थी तो गांव में मेरी परनानी रहती थीं। वे बहुत बूढ़ी होने के बावजूद चूल्हे पर अपनी रोटी खुद ही बनाती थीं। उनके दांत नहीं थे, इसलिए वे बेली हुई नहीं, थापी हुई मोटी रोटी बनाती थीं, ताकि चबाने में आसानी हो। लेकिन जब हम जाते तो वे हमारे लिए तवे पर पतली-पतली रोटियां बनातीं और आग पर उन्हें फुलातीं। वे जब आग को बढ़ाने के लिए लोहे की फुंकनी से फूंक मारतीं तो उनकी आंखों में धुएं की वजह से पानी भर जाता। मैं गौर से नानी का चेहरा देखा करती और सोचती कि नानी हमारी रोटी के लिए इतना कष्ट उठा रही हैं। गांव में मेरा मन जामुन और पेड़े खाने का करता, पर जब खाना परोसा जाता तो मैं रोटी खाने से इसलिए इनकार नहीं कर पाती थी कि मेरे सामने नानी का धुएं में फूंक मारता आंसुओं से भरा चेहरा घूमता रहता।''
मां की बात पूरी होते ही, तब तक घर में आ चुके, पिता ने बोलना शुरू किया- ''मेरे लड़कपन के दिनों में रोटी बनने की प्रक्रिया हमेशा ही चलती रहती थी। पहले गेंहूं खरीदने के लिए राशन की लाइन में लगना पड़ता था। साइकिल पर उसे लेकर घर आते। फिर अम्मां उसे धोती-सुखातीं और बीनतीं। मैं कंधे पर उसे चक्की से पिसवाकर लाता। मिट्टी का तेल लेने के लिए सुबह-सुबह डिपो पर लाइन लगाने जाता। पीपे में भर कर लाए गए मिट्टी के तेल से स्टोव में आग आती, और इस तरह रोटी बनने के सारे इंतजाम होते।''
उनके बोलने के बाद बेटे ने बोलना शुरू किया। वो बोला-''पिताजी, आप लोग रोटी के जिस सूक्ष्म यथार्थ की बात बता रहे हैं वह हमारे अनुभव का हिस्सा नहीं है। आटा गेंहूं से बनता है यह मुझे भी मालूम है। कई सौ टन गेंहूं बारिश में सड़ जाता है और कई करोड़ लोग इस देश में भूखे ही सोते हैं ये दोनों ही तथ्य भी हमें पता हैं, लेकिन हमने कभी भूख को करीब से नहीं देखा। आठवीं क्लास में मैंने हिंदी की किताब में 'पूस की रात' कहानी पढ़ी है, इसलिए मुझे पता है कि कभी ठंड के दिनों में नीलगाय नामक किसी जंतु से अपनी फसल की हिफाजत के लिए किसान खेत में ही सोया करते थे, पर मैने खुद कभी खेत को करीब से नहीं देखा। खेत हमारे लिए एक आभासी संदर्भ की तरह है।''
बेटे ने जब यह कहा तो पिता ने अपनी गिरेबान में झांक कर देखा। वहां उसे कुछ भी नजर नहीं आया।