Friday, July 20, 2012

मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की भंगिमाएं

बहावलपुर हाउस के सम्मुख प्रेक्षागृह में बीते सप्ताह प्रस्तुति 'हिल्डा'
का मंचन किया गया। हिल्डा मिसेज लेमर्चांद की नौकरानी है। पूरा नाटक उसी
के निमित्त से आगे बढ़ता है, पर खुद हिल्डा मंच पर कहीं नहीं है। इस तीन
पात्रीय नाटक के दो प्रमुख पात्र हिल्डा की मालकिन और उसका पति फ्रैंक
हैं। हर फेड इन फेड आउट के बाद इन्हीं में वार्तालाप होता दिखाई देता है।
यानी एक जैसा दृश्य एक जैसे पात्र, और लगभग एक जैसे ही संवाद। मंच के
बीचोबीच सफेद रंग का एक वृत्त है, जिसकी सीमारेखा पर कई एंगल खड़े कर दिए
गए हैं। नाटक में कोई एक्शन नहीं होने से पात्र एक पट्टी के जरिए इन एंगल
के बीच बुनकरी किया करते हैं। पीछे के एंगल ऊंचे हैं। फ्रैंक के घर आई
मालकिन बोल रही है, उससे कॉफी बनाने के लिए कह रही है और फ्रैंक इन एंगल
के बीच पट्टी लपेटने में व्यस्त उसे सुन रहा या अनसुना कर रहा है। आगे के
एंगल छोटे हैं। गुस्से में उबल रहा मालकिन के घर आया फ्रैंक उससे हिल्डा
को बुलाने के लिए कह रहा है, पर वह मुस्कराकर उसकी अवहेलना करती हुई इन
छोटे एंगल के बीच पट्टी से जाल बना रही है। धीरे-धीरे दिखाई पड़ता है कि
शुरुआत की तुलना में दृश्य में एक परिवर्तन आ गया है। मंच के सुथरेपन में
एक अनगढ़ आकार उभर आया है। कहानी का जैसा भी तनाव है, उसमें यह चीज
आहिस्ता, संलग्नता और किंचित अनायास तरह से घटित होती है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक प्रशासन एस. मल्टियार निर्देशित इस
प्रस्तुति का तनाव प्रोसीनियम थिएटर की दो अहम चीजों- अभिनय और साइलेंस-
से बनता है। हिल्डा को एक तरह से बंधक बना लेने वाली मालकिन की भूमिका
में गीता गुहा एक उच्च मध्यम वर्ग की अहंकारी, आत्मतुष्ट और हिंस्र
स्त्री की दिखावटी सौजन्यता की अच्छी भंगिमाएं लिए हुए हैं। वह बताती है
कि वह कितनी दयालु और नेक है और नौकरानी को बराबर का समझती है। कि चाहे
हिल्डा मेरी नौकरानी है, पर इसका यह मतलब तो नहीं कि मैं उसकी बेइज्जती
करूं। उसके संवादों में मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की एक अपनी नाटकीयता है।
वह नौकरानी को अपनी ही तरह साफ-सुथरा बनाने की ज्यादतियों और उसे स्मार्ट
बनाने के नाम पर उसके बाल काट देने को 'डेमोक्रेसी इन एक्शन' बताती है,
पर उसे शिकायत है कि जब वह चाय पीते हुए हिल्डा से बात करना चाहती है, तब
वह बच्चे को दूध पिलाने में व्यस्त रहकर उसकी बेइज्जती क्यों करती है।
फ्रैंक की भूमिका में टीकम जोशी भी अपनी पत्नी को लेकर परेशान कामगार की
भूमिका में ठीकठाक हैं। एक तीसरी लेकिन गौण भूमिका में अंशुल चौहान
हिल्डा की बहन बनी हैं, जो उसकी अनुपस्थिति में घर की देखभाल के लिए आई
हुई है। लेकिन अपनी भूमिका और अभिनय में सबसे ज्यादा गीता गुहा ही मंच पर
दिखती हैं। उनके किरदार में परपीड़ा की कई रंगतें हैं। हिल्डा को कैद
करने के बाद वह फ्रैंक से फ्लर्ट करना चाहती है। आलेख के स्तर पर नाटक कई
चीजों को खुद में समेटे हुए है पर इसमें अंतर्वस्तु के स्तर पर वो जटिलता
नहीं है। बल्कि अपनी नाटकीयता में वो थोड़ा लड़खड़ाया हुआ लगता है।
फ्रैंक ने एडवांस रकम ले ली है, इसलिए हिल्डा को बंधक रहना होगा- यह किस
जमाने का कैसा तर्क है? लेकिन प्रस्तुति की अच्छी बात यह है कि वह डिजाइन
और चरित्रांकन के जरिए एक गति निर्मित करती है। और कुछेक चूकों के बावजूद
उसका सारा विधान अंततः दर्शक को बांधे रखता है।

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