Sunday, July 8, 2012

अपलक निद्राहीन सारी रात


थिएटर ग्रुप आकार कला संगम ने पिछले सप्ताह युवा रंगकर्मी दक्षिणा शर्मा के निर्देशन में बादल सरकार के नाटक 'सारी रात' का मंचन किया। बारिश से बचने के लिए एक युवा पति-पत्नी कहीं वीराने में बने एक मकान में जा पहुंचे हैं। रात की स्याही में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। फिर हालात धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं। यह एक अस्तव्यस्त कमरा है जहां कोई स्टूल कोई मुखौटा आदि इधर-उधर लुढ़के पड़े हैं। पत्नी डर रही है, पति बाहर बारिश का जायजा लेने गया है। उन्हें सुनाई देता है कि उनकी कुछ आवाजें रह-रहकर एक प्रतिध्वनि में तब्दील हो रही हैं। कुछ ही देर में पीछे के कमरे से एक उम्रदराज शख्स वहां प्रकट होता है। वह वहां अकेला रहता है और अनिद्रा का मरीज होने से सारी रात जागता रहता है। वह सब जानता है और पति-पत्नी की मनःस्थिति का गुणा-भाग करके दोनों की सही-सही उम्र बता देता है। हालांकि उसका कहना है कि जानना सांत्वना और कल्पना दोनों को नष्ट कर देता है। पत्नी को लगता है कि 'आप हर बात का एक कवित्तपूर्ण अर्थ कर देते हैं..कुछ ऐसा है जिसे आप खींचकर बाहर निकाल देना चाहते हैं।' पत्नी और इस शख्स की बातचीत के जरिए एक चौथा अनुपस्थित पात्र रंजन नाटक में दाखिल होता है। यह रंजन कभी स्त्री का प्रेमी था। और अब स्त्री को लगता है कि यहां वीराने में अनायास मिला यह शख्स दरअसल रंजन ही है। लेकिन वह ऐसा मानने को तैयार नहीं है। उसका कहना है कि मेरा उत्तरपुरुष रंजन था। स्त्री कहती है- मैं जिस रंजन को जानती हूं वह आकाश है, वायु है। इस तरह नाटक अंतर्वस्तु से एक छायावाद की ओर उन्मुख होता है। और जाहिर है ऐसे में पति के हिस्से में विलेन बनना ही आता है। पत्नी उससे कहती है- मेरा सब कुछ क्या था- क्या तुमने जानना चाहा? मैं तुम्हारी सुख-सुविधा का उपकरण मात्र थी। 
बादल सरकार नाटक में जीवन की जड़ता के बरक्स उसकी आत्मिक संभावनाओं का पाठ बनाते हैं। स्त्री के लिए निर्बोध और कारणहीन-युक्तिहीन प्यार एक ऐसी ही संभावना है। नाटक के अंतिम हिस्से में रंजन उसका सपना या सपने का इलहाम बन चुका है, और निद्राहीन पुरुष ने जाना है असंभव के संभव होने को। 
नाटक कुछ इस तरह का है कि बात छोटी है पर उसका वितंडा ज्यादा है। कथ्य को बाहरी अवयवों से परिपुष्ट बनाने की चेष्टा की गई है। उदाहरण के लिए शुरुआत के दृश्यों में पात्र कई बार अनावश्यक रूप से उत्तेजित नजर आते हैं। बारिश, खिचड़ी, ताश और साड़ी प्रसंग इस क्रम में एक साहित्यिक नैरेटिव के उपकरण मालूम देते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि निर्देशिका ने मुख्य किरदार को जादूगरनुमा बना दिया है। बूढ़े की भूमिका में सुमन वैद एक काला चोगा पहने हुए हैं। इस चोगे को लहराते हुए वे रहस्यमय अंदाज में फुर्ती से मंच पर इधर से उधर जाते हैं। पीछे एक मकड़ी का जाला भी बना है। यह 'उक्ति वैचित्र्य' नुमा नाटकीयता इन दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े रंगकर्मियों में आम हो गई है। जबकि यह किरदार स्पष्ट रूप से यथार्थवादी नाटकीयता की मांग करता है। इस अर्थ में बाकी दोनों पात्र अपने अभिनय और निर्मिति में ठीकठाक हैं। अंशु पवार और नीलेश कुमार दीपक पति-पत्नी की भूमिकाओं में ठीक लगते हैं। अंशु पवार के अभिनय में एक गहराई दिखती है।

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