Sunday, April 15, 2012

पंच नद दा पानी

पंजाबी अकादमी के कुछ अरसा पहले हुए थिएटर फेस्टिवल में नाटककार और निर्देशक
आत्मजीत निर्देशित प्रस्तुति 'पंच नद दा पानी' का मंचन किया गया। प्रस्तुति
में मंच पर चीजें पारंपरिक ढंग से काफी चाक चौबंद नजर आती हैं। हर दृश्य का
बिस्मिल्ला दो सूत्रधार भांडों के जरिए होता है और उपसंहार एक कोरस से। इस तरह
नाटक अपनी वास्तविक लंबाई से करीब डेढ़ गुना ज्यादा समय में फैला हुआ है। मंच
पर तेरहवीं सदी के पंजाब के इतिहास के कुछ दृश्य हैं। यह वो वक्त है जब असल
सत्ता तुर्कों के पास है, और इन तुर्कों की अक्सर मंगोल हमलावरों से लड़ाइयां
हुआ करती हैं। ऐसे में राजपूत राजा राणा रांवल भट्टी की हैसियत यही रह गई है
कि वे तुर्कों के पक्ष में अपने सैनिकों को लड़ाई के लिए भेजते रहें। मनमोहन
बावा की दो कहानियों पर आधारित इस नाटक में कुछ सांस्कृतिक और जातीय सवाल
बीच-बीच में दिखते हैं। तुर्क शासक गाजी मलिक अपने भाई की शादी राणा रांवल की
बेटी से करना चाहता है, जो कि राजपुताना अहं के लिए बड़े धिक्कार की बात है।
लेकिन यह अहं यथार्थ के आगे व्यर्थ है। राणा सांवल की बेटी नीला एक बुद्धिमान
लड़की है जिसमें आत्मसम्मान की पहचान है पर हकीकत के मद्देनजर वह इस स्थिति को
कबूल करती है। दरअसल वह इस नाटक के विमर्श की असल सूत्रधार है। नाटक में एक
दलित पात्र बिरजू इस विमर्श के मकसद से ही है। आत्मजीत उसकी मार्फत हिंदू
जातीय बोध और ब्राह्मणवादी कर्मकांड के नाकारापन को एक दूसरे के बरक्स खड़ा
करते हैं। यह जातीय बोध जो अपने भीतर पैठे झूठ की मूर्खता में उत्तेजित और
बेबस होता है। राणा और उनके राजकीय पंडित जी बिरजू को उसकी जातिगत हैसियत से
ऊपर कुछ भी देना कबूल नहीं करते। ऐसे में अपने ही समाज में बार-बार ठुकराया
गया बिरजू कुरबान अली बनना मंजूर करता है। निर्देशक आत्मजीत ने भारतीय इतिहास
और समाजशास्त्र के एक पुराने प्रश्न की कुछ नए तरह से 'प्लेसिंग' की है, लेकिन
मंच की अनुपातहीन कवायदों में इसकी चमक रह-रहकर बाधित होती है। ठुल्ला भांड और
टुल्ला भांड दो दृश्यों के दरम्यान अक्सर बहुत ज्यादा जगह घेरते हैं। ठुल्ला
कहता है- 'ओए टुल्यां, तू कित्थों आया?' टुल्ला जवाब देता है- 'मां ते टिड
तों.' इस तरह उनकी मसखरी के व्यंग्य, कोरस के रूमान, कई सहप्रसंगों की
संलग्नता के साथ नाटक आगे बढ़ता है। इस दौरान बीच-बीच में महामृत्यंजय के स्वर
भी गूंजते सुनाई देते हैं। तुर्कों को पता है कि हिंद की अंदरूनी कमजोरियां ही
उनके फायदे का सबब बनी हैं। मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज होने का तर्क भी
उनके पास है। पर तुर्क मुखिया को जो समझ नहीं आता और जो वह अपने हिंदू
सिपाहियों से पूछता है, वह यह कि 'तुस्सी सानूं तुर्कां नूं म्लेच्छ क्यूं
कहंदे हो?' कथानक के कई छोर हैं जिनमें से एक नारी-विमर्श तक भी जाता है
कि 'औरत दा जीवन रेखावां दी कैद है'। यह चीज दृश्यात्मकता में भी है- ये
कई तरह की लक्षणाओं और संकेतों को समेटे हुए दृश्य हैं। पार्श्व में परदे
पर एक वृक्ष उकेरा हुआ है। आत्मजीत दृश्य की सामान्य संरचना का मंच पर
अच्छा निबाह करते हैं। लेकिन समूचे तौर पर उसमें विषय के तनाव को कुछ
अधिक सघन होना चाहिए था। अभिनय की दृष्टि से प्रस्तुति काफी ठीकठाक थी।

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