Sunday, April 15, 2012

एक शाम दास्तानगोई की

महमूद फारुकी और दानिश हुसैन की दास्तानगोई एक बार जरूर देखनी चाहिए। करीब आठ-नौ दशक पहले पूरी तरह लुप्त हो चुकी इस लखनवी परंपरा को इधर के सालों में उन्होंने फिर से जिंदा करने की कोशिश की है। दास्तानगोई का उदगम अरब से माना जाता है। इसके असल नायक अमीर हमजा हैं, जो पैगंबर मोहम्मद के हमउम्र चाचा थे। उन्होंने इस्लाम के लक्ष्यों के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और दुनिया-जहान की यात्राएं कीं। अमीर हमजा की बहादुरी के कारनामों की ये कहानियां कई सदियों के दौरान मध्य एशिया और उत्तर पूर्व के देशों में स्थानीय इतिहास-प्रसंगों और मान्यताओं के मुतल्लिक आकार लेकर एक वृहद दंतकथा में तब्दील होती रही। इन दास्तानों के संग्रह को हमजानामा कहा जाता है। बादशाह अकबर ने इन्हें चित्रबद्ध भी करवाया। उन्नीसवीं सदी के मध्य में इसी हमजानामा से 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' ने जन्म लिया। इसके पीछे मुख्य रूप से उस्ताद दास्तानगो मीर अहमद अली का हाथ था। उनके नेतृत्व में लखनऊ के दास्तान कहने वालों ने अमीर हमजा की बहादुरी के साथ नत्थी जिन्नों, परियों वगैरह की अब तक चली आई कहानियों से अलग हिंदुस्तानी रंगत की एक नई दुनिया आबाद की। उन्होंने अच्छे और बुरे के समीकरण में आकार लेने वाली विलक्षण बहादुरी की जगह ऐयारी, जादूगरी, छल-कपट से भरपूर तिलिस्म का एक ऐसा देश तैयार किया, जो ऐसे ही कई और देशों से घिरा हुआ है। आठ हजार पृष्ठ में फैली तिलिस्म-ए-होशरुबा की कहानियों को लखनऊ के मुंशी नवलकिशोर ने उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में मुहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन नाम के दो दास्तान कहने वालों से लिखवाकर अपने नवलकिशोर प्रेस से प्रकाशित करवाया। बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दो दशकों में दास्तानों के श्रोता क्रमशः कम होते गए। इस कड़ी के आखिरी दास्तानगो अली बाकर थे, जिनकी मौत सन 1929 में हुई।
महमूद फारुकी प्रस्तुति से पहले दास्तानगोई के इस तारीखी सिलसिले का एक हल्का-फुल्का परिचय देते हैं। उनके मुताबिक, समझ लीजिए कि होशरुबा तिलिस्म का एक ऑफिस है, जिसका शहंशाह है अफरासियाब और जादूगरों के खुदा हैं सामरी और जमशेद। यहां की कुछ खास चीजें हैं- गिलीम, घुंडी, जाल, आजर जादू और महताब जादू। वे सलाह देते हैं कि उर्दू-फारसी के न समझ में आने वाले अल्फाज पर अटकें नहीं, बस कहानी का सिरा पकड़े रहें। इसके बाद वे और उनके साथी दानिश हुसैनी पूरी रवानी के साथ उस कहानी का बयान शुरू करते हैं जिसमें चांदी का जंगल, चांदी की घास और चांदी का बंदा है, और दरिया-ए-खूं है, जिसपर धुएं का पुल बना हुआ है। मुर्गी के अंडे के नाप का मोती है, जो दरअसल मोती नहीं कुछ और है। एक महल है जिसमें कुछ ऐसा इंतजाम किया गया है कि किसी भी अजनबी के आने पर एक चिड़िया उसका नाम लेती है और गिर कर मर जाती है। इस मुल्क का राजा अफरासियाब जब-तब जमीन में कुछ मारकर एक पुतले को पैदा कर उसे मुहिम पर तैनात कर देता है। पर उसका दुश्मन अमर ऐयार भी कुछ कम नहीं है। उसके पास लाजवाब चतुराई, प्रत्युत्पन्नमति और कई तरह की अलौकिक ताकतें हैं। एक दफे मुसीबत में फंसने पर वो कहता है- मैं तो घसियारा हूं, वक्त का मारा हूं। वह हनुमान जी की एक कहानी भी सुनाता है, जिसमें वे रामचंद्र जी की गिर गई अंगूठी के पीछे-पीछे पाताल तक पहुंच जाते हैं। पूरी दास्तान इस तरह कही जा रही है, कि सुनाने वाले घटनाओं को लेकर पूरे यकीन में दिखते हैं। दानिश हुसैनी किरदार के मुताबिक कई बार स्वर और मुखमुद्राओं में परिवर्तन लाते हैं। सुनाने के ढंग में एक व्यवधानहीन गति है। इसी रौ में सुनने वाला बंधा रहता है। दास्तान की तमाम रोचकता वाचिक की लय के बगैर यहां अधूरी है। यह वाचिक की ही ताकत है जो सुनने वाले को एकाग्र कर उसमें रस निर्माण करती है।

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