Saturday, February 25, 2012

सिद्धांत भी एक नाटक है

भारत रंग महोत्सव में पोलैंड के थिएटर ग्रुप कोरेया की प्रस्तुति 'ग्रोटोव्स्की- एन एटेंप्ट टु रिट्रीट' का प्रदर्शन सोमवार को कमानी प्रेक्षागृह में किया गया। जर्जी ग्रोटोव्स्की पिछली सदी के उत्तरार्ध में सक्रिय रहे पोलैंड के रंगकर्मी और रंग-सिद्धांतकार थे। उनकी पूअर थिएटर की अवधारणा रंगमंच को सिनेमा के प्रभावों से बरी रखने के अर्थ में थी। उनका राय में थिएटर को वह नहीं होना चाहिए, जो वह नहीं हो सकता। उनका कहना था कि रंगमंच अगर सिनेमा से ज्यादा वैभवशाली नहीं हो सकता, तो इसे गरीब ही रहने देना चाहिए। हमारे यहां मोहन राकेश भी अभिनेयता की तुलना में लाइट्स, मंच-सज्जा आदि के जरिए अतिरिक्त प्रभाव निर्मित किए जाने के खिलाफ थे, पर ग्रोटोव्स्की ने इस विचार को ज्यादा मुकम्मल शक्ल में पेश किया। उन्होंने अभिनेता और दर्शक के रिश्ते में अन्यमनस्कता पैदा करने वाली हर चीज को खारिज किया। उनके लिए मंच पर किया जा रहा अभिनय ही बुनियादी चीज थी। लेकिन वे 'मैथड एक्टिंग' के नपेतुलेपन के पक्षधर भी नहीं थे। अभिनय उनके लिए स्तानिस्लाव्स्की और स्ट्रासबर्ग पद्धतियों का हुनर मात्र न होकर अभिनेता की मानसिक और शारीरिक प्रतिक्रियाओं का एकीकरण था। इसके लिए वे अभिनेता में गंभीरता, एकाग्रता और प्रतिबद्धता को आवश्यक मानते थे। स्वयं में से उदभूत स्वर और देह की स्वाभाविकता उनके लिए ज्यादा अहम थी। और इसके लिए किसी तकनीक की तुलना में आत्मचेतस होने की प्रक्रिया को वे ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते थे।
निर्देशक टॉमस्ज रोडोविक्ज निर्देशित इस प्रस्तुति में इस प्रक्रिया का जिक्र अभिनेता बार-बार करते हैं। दरअसल यह पूरी प्रस्तुति ऐसी कई प्रक्रियाओं के जिक्र का ही एक विस्तार है। प्रस्तुति का मंच बगैर विंग्स के एक चौकोर हॉल की शक्ल में है। इसके एक कोने पर एक मेज रखी है, जिसके अंदर की गहराई में शीशों से रोशनी दिख रही है। शुरुआत में छह अभिनेता इसके इर्द-गिर्द खड़े हैं, जिनमें एक कुछ हकलाता है। निर्देशक के वक्तव्य के दौरान वह थोड़ा बेसब्र है। कहीं कुछ ऐसा नहीं है जो योजनाबद्ध लग रहा हो, पर योजनाहीनता की कोई चेष्टा भी नहीं है। निर्देशक के बाद अभिनेतागण अपने अनुभव और राय बता रहे हैं। इनमें कुछ सवाल भी हैं कि 'अपने अकेलेपन के साथ इंसान क्या कर सकता है' कि 'एक अ-अनुकूलित (deconditioned) शरीर जानवर की तरह है' कि 'एक पापी ही संत हो सकता है', कि 'कुछ नहीं हो रहा- यह सिर्फ भावनाओं का खेल है' कि 'लेकिन कुछ भी कैसे रचें, जबकि आप दूसरों से नियंत्रित हैं' कि 'जीने और रचने के क्रम में आपको खुद को स्वीकार करना होगा'। इसी क्रम में तरह-तरह की देहगतियों का मुजाहिरा भी अभिनेतागण करते हैं। यह एक सिद्धांत के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया है, जिसमें प्रदर्शनप्रियता जैसी खराबियों से बचने का मशविरा निहित है।

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