Sunday, September 4, 2011

प्रयोग और प्रगतिशीलता

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों की डिप्लोमा प्रस्तुतियों में प्रयोगशीलता अक्सर सौंदर्य प्रसाधनों की तरह होती है, जिससे प्रस्तुति को सजाया-संवारा जाता है। बीते दिनों विद्यालय परिसर में हुई कर्नाटक की सहाना पी निर्देशित प्रस्तुति 'जन्नत महल' इस लिहाज से दिलचस्प थी। इसका मंचन तीन ओर कॉरिडोर से घिरे एक चौकोर लॉन में किया गया। कॉरिडोर में बैठे दर्शकों और मंच के बीच एक पारदर्शी पन्नी या मोमजामा था, जो आधी प्रस्तुति के बाद हटा दिया गया। मोमजामे के दूसरी ओर नाटक की नायिका जुलेखा की दुनिया का जिक्र कुछ यूं था कि पहले ही दृश्य में वह मंच के एक छोर पर खड़े पेड़ से कूदती है। उसका पति मरा पड़ा है, पर वह प्रफुल्लित स्वर में गमगीन लोगों से जामुन और बादाम खाने के बारे में पूछती है। लोग कहते हैं 'कैसे चहक रही है, क्या इसे जहन्नुम का भी खौफ नहीं' या यह कि 'शायद शौहर की मौत के सदमे में यह ऐसी हो गई है'। मंच के बीचोबीच कफन से ढका मरा पड़ा पति बीच-बीच में उठकर जुलेखा को सिर ढकने वगैरह की हिदायतें देता है, और फिर मंच के एक सिरे पर कतार से खड़े अलग-अलग ऊंचाई के छह-सात रेफ्रिजरेटरों में से एक में जाकर बैठ जाता है। जुलेखा को अब इज्जत के 40 दिन और 40 रातें एक सफेद कोठरी में बितानी हैं, ताकि पुष्टि हो सके कि उसकी कोख में तो कुछ नहीं है। शरीर से बिल्कुल चिपके कसे हुए कास्ट्यूम में पात्रों का एक दल छाती पीटते हुए मंच से गुजरता है- रो जुलेखा रो, तेरा शौहर नहीं रहा। जुलेखा अब लोहे की जाली से बनी कोठरी में बैठी है। अंधेरे में डूबा मंच, जहां कोठरी की सफेद रोशनी में अकेली बैठी है जुलेखा। शौहर की गुलामी से आजाद होने के बाद उसकी तकदीर का अब क्या होगा! क्या करोगी जुलेखा, मां-बाप के घर में अब तुम्हारी कोई जगह नहीं। और यहां शौहर का भाई मुनीर कितने दिन तुम्हें झेलेगा? लेकिन मुनीर, जिसकी नाक से लेकर ठुड्डी तक एक काली लकीर खिंची हुई है, एक नए खयाल का इंसान है। शौहर की गुलामी झेलती रही जुलेखा से शादी करके वह उसे एक आजाद जिंदगी देना चाहता है। बताओ 11 हजार नगद दो अशर्फी सिक्काए राजुल हक देना तय हुआ है, क्या निकाह आपको मंजूर है? स्टेज पर झालरें खींच दी जाती हैं, कव्वाली गूंजने लगती है, अगरबत्तियां जलाई जाती हैं और इस तरह शादी की रस्म मुकम्मल होती है। मुनीर किताबों का एक बंडल लाया है। वह कहता है- जुलेखा इन किताबों को पढ़ो, दुनिया के बारे में जानो। लेकिन अम्मां, जिनके होंठ से गाल तक विद्रूप फैलाती मूंछ जैसी एक काली लकीर खिंची है, कहती हैं, जुलेखा, मुनीर बाहर क्यों सोता है, मुझे पोते का मुंह देखना है। यह रहस्य जुलेखा की समझ से भी बाहर है और दर्शकों की भी कि मुनीर बीवी को छोड़ अचानक टपकी महिला उद्धार समिति की नेता से इश्क क्यों लड़ा रहा है। इसकी वजह यह है कि जुलेखा उसके लिए बासी भात है, कि उसने उससे शादी इसलिए की कि संपत्ति में बंटवारा न हो, कि भाई की आबरू इधर-उधर मुंह न मारे, वगैरह।
नाटक में मरने के बाद फ्रिज में बैठे शौहर अकबर मियां बीच-बीच में दरवाजा खोलकर बाहर भी ताक-झांक करते हैं, भाई के साथ एक गेंदनुमा चीज से कैच-कैच का खेल खेलते हैं। शुरू के दृश्यों में पात्र बोलते हुए एक चिंहुंक की स्वर युक्ति भी बनाते हैं। शुरू में लगता है मानो यह एक एब्सर्ड नाटकीयता वाली एक प्रयोगपूर्ण प्रस्तुति मात्र है। लेकिन धीरे धीरे उसमें कथानक का ताना बाना भी खुलता है। इसमें कोई शक नहीं कि निर्देशिका सहाना पी में रंग-उपक्रमों की अच्छी समझ है। उनके दृश्यों में अक्सर स्थितियों की एक वक्र भंगिमा दिखाई देती है और भावार्थपूर्ण छवियां भी। इज्जत के दिन वाले दृश्य में वे सन्नाटे से और शादी वाले दृश्य में वे रेकॉर्डेड स्वरों से स्थितियों का एक अच्छा माहौल बनाती हैं। लेकिन उनकी प्रयोगशीलता और कथानक के फ्लेवर में कहीं एक व्यवधान भी है। न यह खालिस प्रयोग है, न यथार्थवाद...यह दो नावों में सवारी जैसा कुछ है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ट्रेनिंग डिजाइन सबसे ज्यादा सिखाती है, विजन सबसे कम। कन्नड़ लेखक फकीर मुहम्मद कतपड़ी की कहानी और आसिफ अली के आलेख की स्त्री मुक्ति का प्रगतिशील विचार एक अतिआधुनिक प्रयोगवादी मुहावरे में किंचित मिसफिट लगता है। सहाना पी के मंचीय प्रयोगवाद में बहुत कुछ खपा दिया गया है। रेफ्रिजरेटर तक तो ठीक था, अंतिम दृश्य में पानी का खेल कुछ ज्यादा और महंगा मालूम देता है। मंच पर पानी होगा तो पात्रगण उसमें तैरेंगे ही। ऐसा ही होता भी है। आखिर व्यवहारजगत में रंगकर्मी ऐसा पानी की नलकियों से युक्त मंच कैसे बना पाएंगे..। बहरहाल इस सब के बावजूद प्रस्तुति में एक ऐसी रंगदृष्टि और चमक है, जो एक बिल्कुल युवा रंगकर्मी को लेकर उम्मीद पैदा करती है।

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