Tuesday, August 2, 2011

मौन में व्यंजना

युवा रंगकर्मी लोकेश जैन ने पिछले वर्षों के दौरान एक खास तरह के थिएटर में प्रवीणता हासिल की है। वे मंच पर सीमित संसाधनों से एक ऐसी रंगभाषा रचते हैं जो अपने लालित्य, सादगी और लय में प्रभावित करती है। वे मंच पर एक ऐसा काव्यात्मक मुहावरा रचने की कोशिश करते हैं, जिसमें छंद और अमूर्तन एक साथ शामिल है। खास बात यह है कि यह काम वे स्कूल में पढ़ने वाले किशोर उम्र के कलाकारों के साथ करते हैं। सोमवार को नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी सभागार में उन्होंने प्रस्तुति 'ख्वाबों के बुलबुले' का मंचन किया। प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं है पर स्थितियों और घटनाओं की सांकेतिकता में एक कथ्य उसमें दिखाई देता है। लगभग सपाट पीली रोशनी में आकार लेती प्रस्तुति में मंच पर कई पात्र पुतुल शैली में उपस्थित हैं। मंजीरे और बांसुरी के स्वरों पर उनकी देहगतियां एक दृश्य रचती हैं। कभी चिड़ियों की चहचहाहट, कभी घड़े में सिक्कों के उछाले जाने का स्वर, फिर ड्रम के रौद्र स्वर, फिर अचानक शांत आलाप...। स्टेज पर आगे की ओर सफेद रंग में लीपा हुआ एक घड़ा रखा है। एक पात्र वैसे ही रंग के लोटे से सूर्य को अर्घ्य चढ़ाने की मुद्रा में है, उसके लोटे से लाल रंग का कुछ तरल घड़े पर गिरता है। फिर घड़ा उठा लिया जाता है। वाचिक के आलाप में, वाद्य के स्वरों में, रोशनी के वाल्यूम में अचानक एक तेज उतार-चढ़ाव होता है। दर्शक को घेरने वाले इस तेज दृश्य में घड़ा हाथ से छूटता है और तेज आवाज में उसका टूटना सबको अवाक कर देता है। सभी पात्र टूटे घड़े के आसपास जमा हैं। उसकी मिट्टी को मसलते, उसे कोई आकार देते और इस रचने के सुख को महसूस करते। धीन ताना तेरे नाम...धीन ताना तेरे नाम...गोल गोल नाच रही एक लड़की गिर पड़ती है, सब कुछ रुक जाता है और इस तरह एक नया भाव दृश्य में प्रवेश करता है। एक दूसरी लड़की उसकी मदद को आगे आई है। स्नेह और सहानुभूति के इजहार में वह उसके चेहरे और पांवों पर उसी तरह मिट्टी लेप रही है जैसे वधु के शरीर पर हल्दी लगाई जाती है। कुछ देर बाद सभी पात्र कुछ न कुछ मिट्टी में सने दिखाई देते हैं। उनकी बनाई मिट्टी की नन्ही नन्ही आकृतियां मंच पर आगे की ओर रखी हैं। शायद वे इन्हीं आकृतियों का प्रतिरूप हैं। फिर मंच के एक छोर से एक ऐसा शख्स प्रवेश करता है जो सिर से पैर तक इस कदर मिट्टी में सना है मानो उसे जमीन से खोदकर निकाला गया हो। वह गुड़ी मुड़ी गठरी सा आगे बढ़ता है। लड़की प्रेम में या शायद सहानुभूति में उसे सहलाती है। लड़के की गतियां चौपाए पशु की सी हैं। फिर वह होमोसेपियन की तरह खड़ा हो जाता है।... कुछ ही देर में मंच पर सिर्फ आदम और ईव जैसे दो पात्र हैं। पीछे की ओर एक स्त्री दिखाई देती है जिसके बालों में बंधी लंबी डंडी पर कुछ पत्तों के बीच एक फूल है।....
निर्देशक लोकेश जैन का मानना है कि संवाद या शब्द एक बौद्धिक सूचना होते हैं, लेकिन छवियां हमें हमारे अनुभव में प्रभावित करती हैं, और इस प्रस्तुति को इस रूप में करने की यही वजह है। उनके मुताबिक रचनात्मकता का स्त्रीत्व की ऊर्जा से गहरा ताल्लुक है जैसा कि उन्होंने इस प्रस्तुति में दिखाने की कोशिश की है। प्रस्तुति में कुछ अच्छी रंग छवियां हैं। विशेष बात यह है कि उसमें स्वरों के सभी उपक्रम लाइव घटित होते हैं, और इस तरह साक्षात का वास्तविक आस्वाद प्रस्तुति में बरकरार रहता है। लोकेश जैन बहुत सी स्थितियों का एक कोलाज बनाते हैं। किसी पेंटिंग की तरह। इस पेंटिंग में कहीं कोई चमत्कार नहीं है। सीमित संसाधनों में तैयार किए गए बहुत से सादगीपूर्ण प्रयोग हैं। एक मौके पर अस्फुट सी किलकारियों से एक दृश्य बनता है, तो किसी अन्य मौके पर पात्रों के बीच घटित हो रही मौन गतियां मानो एक मासूमियत या निष्कपटता की व्यंजना करती हैं। शायद यह बेहतर ही था कि रंगमंचीय रोशनियां प्रस्तुति में नहीं थीं।

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