Sunday, July 31, 2011

उकताहट और तीन औरतें

सौरभ शुक्ला निर्देशत 'रेड हॉट' प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार नील साइमन का नाटक है। हिंदी में स्वयं सौरभ ने इसका रूपांतरण किया है। इसके केंद्र में एक ऐसा किरदार है जिसकी शादी को 22 साल हो चुके हैं और इस उम्र में उसे लगने लगा है कि जिंदगी बडी बोरियत भरी है, कि कहीं उसकी कोई पूछ नहीं है, कि वह व्यर्थ में ही समय बिताए जा रहा है, वगैरह वगैरह। ऐसे में अपनी जिंदगी में थोड़ी उत्तेजना लाने के लिए उसके दिमाग में विवाहेतर संबंध का आइडिया आता है। यह नाटक इसी सिलसिले में तीन अलग अलग किस्म की स्त्रियों से उसकी मुलाकात याकि मुठभेड़ की कहानी है। अपनी समूची मंचीय संरचना में प्रस्तुति लगातार काफी चुस्त है। उसकी मंच सज्जा में कहीं कोई झोल नहीं, कोई विंग्स नहीं। काफी बारीकी से फ्लैट के अंदर का दृश्य बनाया गया है, जिसमें ड्राइंगरूम से जुड़ा एक टेरेस है, जहां से झांककर नीचे गार्ड को आवाज दी जा सकती है। ड्राइंगरूम में एसी लगा है। कारपेट है। रसोई में सर्विस विंडो है, जहां से भीतर और बाहर खड़े दोनों पात्रों की बातचीत और कार्रवाइयां दर्शकों को दिखाई देती हैं। रसोई के भीतर रखे फ्रिज का थोड़ा सा हिस्सा भी दिखाई देता है। यानी दृश्य के यथार्थवाद में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। हिंदी थिएटर में अक्सर दिखाई देने वाले चीजों के चलताऊपन से यह प्रस्तुति पूरी तरह बरी है। मंच के बाएं सिरे पर एक दरवाजा है जिससे पात्र दृश्य में प्रवेश करते हैं।
पहली आगंतुका एक शादीशुदा स्त्री है। मुख्य पात्र परमिंदर सिंह सेठी उससे खान मार्केट के अपने रेस्त्रां में मिला था। इस मुलाकात का प्रयोजन उनके बीच स्पष्ट है, पर पुरुष इधर उधर की तमाम बातें किए जा रहा है और स्त्री मुद्दे पर आना चाहती है। वो बताता है कि उसने बारहवीं क्लास में ही लोलिता उपन्यास पूरा पढ़ लिया था, कि उसके डैडीजी ने कहा था कि पम्मी बिजनेस में अच्छा करना है तो अच्छा सूट पहनो। फिर वो उससे पूछता है कि क्या उसकी शादी में कोई प्रॉब्लम है जो वो उससे इस तरह मिलने आई है। उसकी बातों से ऊबी और थकी स्त्री स्पष्ट करती है कि वो यहां सेक्स के लिए आई है क्योंकि इससे उसे खुशी मिलती है, और यह कि किसी भी संबंध में सच सबसे जरूरी चीज है। लेकिन पम्मी को वह भावनाविहीन और आत्माविहीन मालूम देती है। उससे मिलने आने वाली दूसरी लड़की एक चलती पुर्जी फिल्मों की छोटी-मोटी एक्ट्रेस और मॉडल है। जो बताती है कि अब तक उसके 35 बॉयफ्रेंड रहे हैं, और कहती है- 'आदमी बड़े हॉर्नी होते हैं सरजी'। इस लड़की से बात कर रहे पम्मी में प्रौढ़ उम्र की कई इच्छाएं जाग्रत होती मालूम देती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह वैसा ही नाच रहा है जैसा लड़की उसे नचा रही है। तीसरी स्त्री उसके दोस्त की पत्नी और उसकी अपनी पत्नी की सहेली है। यहां स्थिति पूरी तरह बदली हुई है। वो उसे बताती है कि वो उससे भावनात्मक तौर पर मिलने आई है, न कि शारीरिक आकर्षण की वजह से। पम्मी उसे इस मुलाकात की संगत वजहें बता रहा है और असली सवालों में जाने से बच रहा है।

नाटक का एक दृश्य

नाटक का एक दृश्य

छोटी-छोटी चीजें होती हैं जो थिएटर का आकर्षण बनाती हैं। कई तरह की दुविधाओं से घिरे प्रौढ़ उम्र के शख्स का चरित्र बनाने में सौरभ इनका सफल इस्तेमाल करते हैं। वो कनाट प्लेस में रिवोली के पास है- यह बात पत्नी से छिपानी है, या उसे पता भी चल जाए तो क्या फर्क पड़ता है- नुमा असमंजस पम्मी के किरदार का स्थायी भाव हैं। नए सेक्स संबंध में जाने की उसकी ऊहापोह या झट से उसे लपक लेने की उत्तेजना आदि भंगिमाएं प्रस्तुति में काफी रोचकता लाती हैं। तीन स्त्रियों के साथ वो तीन भावदशाओं में नजर आता है। आलेख इतना कसा हुआ है कि चार अलग-अलग चरित्रों की मानसिक दुनिया की उठापटक निरंतर उसमें एक दिलचस्प गति बनाए रखती है। तीनों स्त्री भूमिकाओं में निगार खान, मोना वसु और प्रीति ममगाईं का चरित्रांकन और अभिनय भी उतना ही कसा हुआ था। खास तौर से मॉडल लड़की की भूमिका में मोना वसु ने किरदार के कई शेड्स का अच्छा इस्तेमाल किया है।

Tuesday, July 19, 2011

नाटक एक उत्पाद है

रंग निर्देशक सुरेंद्र शर्मा ने उसी तरह हिंदी के कई क्लासिक उपन्यासों- 'बूंद और समुद्र', 'रंगभूमि', 'मैला आंचल', 'बाणभट्ट की आत्मकथा' आदि- को रंगमंच पर पेश किया है, जिस तरह देवेंद्र राज अंकुर ने अपने 'कहानी का रंगमंच' में कहानियों को। लेकिन अंकुर की तरह उन्होंने कभी किसी शैली में बंधने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय वे उपन्यास की संवेदना और उसकी छवियों के रूपाकार पर अधिक केंद्रित रहे हैं। इधर उन्हें क्या सूझी कि उन्होंने विष्णु प्रभाकर जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी तीन कहानियों का लगभग अंकुर शैली में मंचन किया। बीते सप्ताह भाई वीर सिंह मार्ग स्थित मुक्तधारा प्रेक्षागृह में हुई रंगसप्तक की इस प्रस्तुति में विष्णु प्रभाकर की तीन कहानियों- 'कितने जेबकतरे', 'डायन' और 'धरती अब भी घूम रही है'- में कहानियों का नाट्य रूपांतरण नहीं किया गया है। उन्हें मंच पर सुनाया जा रहा है और इस सुनाए जाने के बीच वे मानो उदाहरण के लिए घटित भी होती हैं। घटित होने का यह ढंग निहायत अनौपचारिक है। जैसे वाचन में कहानी पूरी स्पष्ट न हो रही हो, इसलिए अभिनय के जरिए भी उसकी एक रूपरेखा बनाई जा रही हो। प्रस्तुति का यह ढंग कहानी के यथार्थ के प्रति दर्शक की तल्लीनता को खंडित करता है। यह एक टकसाली किस्म की कला है, जिसमें किसी भी कहानी का मंचीय उत्पादन बगैर दिल और दिमाग पर ज्यादा जोर डाले किया जा सकता है। अंकुर इसी पद्धति से अब तक सैकड़ों कहानियां मंच पर उतार चुके हैं, पर बेहद लगन से अपना काम करने वाले सुरेंद्र शर्मा से ऐसी उम्मीद नहीं थी, जिन्होंने 'कहां मेरा उजियारा' जैसे अस्तव्यस्त आलेख की सारी कमियों को दृश्य-श्रव्य के सटीक संयोजनों से एक भव्य और रोचक प्रस्तुति में ढंक दिया था।
प्रस्तुति में शामिल 'डायन' एक एकाकी बूढ़ी स्त्री की कहानी है। पुराने दिनों के समाज में लोगों की खुराफाती बुद्धि बैठे-ठाले उसे डायन मान लेती है। किस्से-कहानियों में जीने वाला समाज इसी तरह कुछ भी मान लेता है। और उसे इसके कुछ प्रमाण भी मिल जाते हैं। लेकिन वास्तव में इससे उसकी कई ग्रंथियां संतुष्ट होती हैं। इससे उनकी असुरक्षा को एक मोहरा मिल जाता है। इससे उनके भीतर की क्रूरता को एक विलेन मिल जाता है। संसार की सारी व्याख्याओं का उत्स 'मैं' हूं, इसलिए उस दूसरे की दुनिया की दिक्कतों से हमें क्या लेना-देना। विष्णु प्रभाकर की कहानी जीवन के उस हिस्से को भी दिखाती है, जहां बुढ़िया गफूरन अपने एकाकीपन में किसी मनुष्य के साथ को तरस रही है। वह किसी छोटे बच्चे को दुलारती है तो लोग इसमें अनिष्ट समझते हैं। गफूरन बनी नीलम ने एक हीन जीवन का अच्छा कारुणिक चित्र मंच पर खींचा है, हालांकि बाकी पात्र उस तुलना में काफी लाउट किस्म के नाटकीय थे। कहानी मेलोड्रामा में सुखी रहने वाले समाज की विडंबना का एक दुखांत टुकड़ा है। प्रस्तुति की तीनों कहानियों में यह निश्चित ही सबसे बेहतर थी।
इससे पहले मंचित की गई 'कितने जेबकतरे' में महानगरीय जीवन के उस लालच को दिखाया गया है, जहां हर आदमी अपनी चालाकियों में लगभग जेबकतरों जैसा हो चुका है। तीसरी और विष्णु प्रभाकर की सबसे प्रसिद्ध कहानी 'धरती अब भी घूम रही है' का विषय भी प्रकारांतर से यही है। पिता के जेल जाने पर मौसी के घर में रह रहे दो बच्चे मौसी मौसा द्वारा रोज सताए जाते हैं। वे रोज सुनते हैं कि लड़की और पैसे से हर काम हो जाता है। दोनों नन्हें बच्चे एक रोज जज साहब के घर जा पहुंचते हैं। अपने पास जमा किए हुए फुटकर पैसे जज को देने के बाद दूसरी चीज के तौर पर लड़की खुद को पेश करती है। कहानी तब की है जब भ्रष्ट लोग आज की तरह इम्यून नहीं हुआ करते थे। लिहाजा चल रही पार्टी में दो नादान बच्चों का यह ऑफर जज साहब और सबको अवाक कर देता है। प्रस्तुति अवाक रह जाने का सही क्लाइमेक्स नहीं बना पाती। अत्याचार और दुख दोनों ही उसमें पुराने किस्म के हैं। सुरेंद्र शर्मा ने बगैर किसी मंचीय मंजाव के उन्हें चित्रित किया है, इसलिए वे बहुत अभिव्यक्तिपूर्ण नहीं बन पाए हैं। प्रस्तुति का यह एक बेहतर पक्ष है कि उसमें कथावाचक और पात्र अलग-अलग हैं, लेकिन 'नाटकीय' किस्म के दृश्य और बीच बीच में टपक पड़ता वृत्तांत वाचन स्थितियों को सायास और बोझिल बना देता है।