Saturday, May 14, 2011

अभिनय में एक दृश्य था

रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'क्षुधित पाषाण' याकि भूखे पत्थर की प्रस्तुति बुधवार को संगीत नाटक अकादेमी के मेघदूत प्रेक्षागृह में की गई। आलोक चटर्जी के एकल अभिनय वाली इस प्रस्तुति का आयोजन अकादेमी की कार्यक्रम श्रृंखला रवींद्र प्रणति के अंतर्गत किया गया। क्षुधित पाषाण में कहानी के भीतर एक कहानी है। कहानी सुना रहा नायक रूई का महसूल वसूलने वाला एक इंस्पेक्टर है। उसे बरीच नाम की एक सुरम्य जगह पर तैनाती मिली है। यह कहानी यहीं के एक जनशून्य प्रासाद की है, जहां उसे रहना है। प्रासाद के कर्मचारी दिन में तो उसकी सेवा को तत्पर हैं लेकिन शाम के बाद वे वहां नहीं रुकना चाहते। अकेले नायक को यहां कुछ ऐसा अदभुत देखने को मिलता है कि 'दिन की शाला पर एक दीर्घ कृष्ण यवनिका' के घिरते ही वह इसमें घिरने लगता है। रुकने के पहले रोज ही उसे कुछ रमणियां नजदीक से गुजरती दिखती हैं और फिर पानी में छपाक-छपाक के स्वर। और दिखती है अभिसार की प्रतीक्षा में एक अरब देश की तरुणी। नायक को लगा मानो यह अवास्तविक व्यापार ही जगत का एक मात्र सत्य हो। कि यथार्थ में साढ़े चार सौ रुपए पाने वाला रूई का महसूल इंस्पेक्टर श्रीमान का पुत्र मैं श्रीयुत...वगैरह एक भ्रम हो। अगले रोज प्रासाद के रहस्य में बंधा नायक खुद को रोक नहीं पाया। सीढ़ियां उसे एक कक्ष में ले गईं। अहर्निश ध्वनित होते उस विशाल जनशून्य कक्ष के बाद एक और कक्ष उसे दिखा, जहां अरब वेश की तरुणी उसे फिर दिखाई दी, और दिखाई दिया नंगी तलवार लिए खड़ा एक हब्शी। फिर उसने अपनी शैया के नीचे उसी रमणी का स्पष्ट अनुभव किया। यह सब क्या है! 'तफात जाओ....सब झूठ है'- हैरान नायक को महल के बाहर पागल मेहर अली के स्वर सुनाई देते हैं। पूछने पर वह कुछ नहीं बता पाता। लेकिन दफ्तर के बूढ़े क्लर्क करीम खां ने उसे बताया कि मेहर अली एकमात्र शख्स है जो महल में तीन दिन से ज्यादा रहने के बावजूद बच गया। ढाई सौ साल पहले महमूदशाह द्वितीय के बनवाए इस महल को लेकर नायक की बेचैन बढ़ती जा रही है। उसे पता चला कि महमूदशाह ने यह महल अपने भोगविलास के लिए बनवाया था। हर रोज यहां भोगविलास की महफिलें जुटतीं। वक्त बीता। महमूदशाह नहीं रहा, न महफिलें, पर उसके भोग की क्षुधा यहां के पत्थरों में बची रह गई। उसी भोगलिप्सा के कारण यह प्रासाद क्षुधित है, यह यहां हर रहने वाले को फाड़ खाना चाहता है।
कहानी यहां खत्म नहीं हुई। नायक उसके अहम सिरे को बताने को तत्पर है। सुना रहा नायक और सुन रहा लेखक दोनों रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, कि तभी नायक की ट्रेन आ जाती है। उत्सुक लेखक को मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। नायक जा चुका है। कहानी में फिर क्या हुआ, क्या हुआ होगा महल में- यह अब कैसे पता चले। कि तभी लेखक को समझ आता है कि अरे यह तो एक कपोलकल्पना थी। समय काटने का एक बहाना। एक किस्सा।
आलोक चटर्जी हिंदी रंगमंच के सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक हैं। स्पीच का वैभव देखना हो तो उनकी यह प्रस्तुति जरूर देखनी चाहिए। वे तत्सम भाषा को एक रंगमंचीय औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं और स्वर के उतार-चढ़ावों से दृश्य बनाते हैं। क्लर्क करीम खां पान खाए हुए बोलता है। कुछ स्थितियों में लगभग फुसफुसाहट से रहस्य का एक दृश्य बनता है। इस तरह भाषा जो दृश्य बनाती है आलोक चटर्जी उस भाषा के वाचिक रूप को ज्यादा दृश्य-सक्षम बनाते हैं। तरह-तरह की स्थितियों से गुजर रहा नायक पसीना-पसीना है, या मोहाविष्ट है या आसक्त या डरा हुआ और उत्तेजित। मंच पर एक गुलदान, एक मेज और एक शैया। आलोक इस स्पेस के बीच टहलते हुए अपने किरदार को अंजाम देते हैं। कहीं कोई अतिरिक्त नाटकीयता नहीं। हालांकि रोशनी के कुछ कल्पनाशील वृत्त प्रस्तुति को अधिक आकर्षक बना सकते थे। लेकिन उनके बगैर भी पूर्णतः अभिनय आधारित यह एक बेहतर प्रस्तुति थी। प्रस्तुति का लाइट डिजाइन शोभा चटर्जी का था।

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