Saturday, May 14, 2011

कलावाद की कवायद

हिंदी थिएटर में हर कोई प्रभावात्मक किस्म के प्रयोग करने पर उतारू है। युवा रंगकर्मी राजकुमार रजक निर्देशित इलाहाबाद के थिएटर ग्रुप एक्स-ट्रा की प्रस्तुति 'सूरज का सातवां घोड़ा' कुछ इस तरह की है कि उसमें इस उपन्यास की जगह कोई भी कविता, कहानी, उपन्यास, आख्यान फिट किया जा सकता है। प्रस्तुति नैरेटिव का कोई प्रकार पेश नहीं करती, क्योंकि नैरेटिव का यहां कोई मूल्य ही नहीं है। वह एक दृश्यात्मक कलावाद में नौकर की तरह मौजूद है। एक जैसी पोशाक में छह अभिनेता मंच पर किसी शास्त्रीय ऑपेरा जैसे दृश्य निर्मित करते हैं। ये देहगतियों की लय से बनने वाले दृश्य हैं। इनमें कास्ट्यूम और प्रकाश योजना के रंग हैं। बुल्ले शाह के बोलों की सूफियाना रंगत से लेकर केसरिया बालमा आवो मोरे देस तक के आलाप हैं। दो लाठियों को पालकी में बदल देने जैसी दृश्य युक्तियां हैं। तरह-तरह की बुदबुदाहटें हैं। लेकिन कुछ नहीं है तो पाठ का संप्रेषण। प्रस्तुति के डिजाइन में संप्रेषण किसी प्रयोजन की तरह नजर ही नहीं आता। पूरी प्रस्तुति एक वायवीयता की शिकार मालूम देती है। उसके प्रभावात्मक प्रयोग में उपन्यास का एक सहयोगी इस्तेमाल भर हो ऐसा भी नहीं है, क्योंकि पूरा उपन्यास पात्रों द्वारा मंच पर नैरेट किया जाता है। प्रस्तुति में निर्देशक की रंग-प्रतिभा, कलाकारों का परिश्रम और काफी ऊंचे दर्जे का संगीत पक्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन एक नकलची किस्म का प्रस्तुति आइडिया उनको उनकी वास्तविक ऊंचाई तक पहुंचने नहीं देता।
एक अन्य प्रस्तुति मनीष मित्रा निर्देशित 'बिफोर द जर्मिनेशन' में एक अन्य प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह है स्थितियों के मर्म तक पहुंचता दिखने के लिए उन्हें ज्यादा ऐंद्रिक बनाना। प्रस्तुति ओरियाना फैलासी के अ लेटर टु अ चाइल्ड नेवर बॉर्न से प्रेरित है, जिसमें एक मां अपने गर्भस्थ शिशु से बात करती है और मां का बयान सुनने के बाद शिशु जन्म लेने से इनकार कर देता है। प्रस्तुति के शुरू में ही पीछे लगी स्क्रीन पर खजुराहो की इरोटिक मूर्तियों की छवियां दिखती हैं, फिर संभोग की स्थिति को दर्शाने वाला एक 'कलात्मक' दृश्य और फिर बलात्कार की हिंसा और और फिर नायिका का विलाप की ऊंचाई तक पहुंचता रुदन। मंच के एक छोर पर लाल कपड़े के घेरे में एक घड़ा, बीच के छोर पर आग और नरमुंड, अस्थि आदि। तंत्र साधना जैसे इस दृश्य के समांतर पीछे की स्क्रीन पर स्वस्तिक का निशान उभरता है और 'वैष्णव जन तो तेने कहिए..' के स्वर। मंच पर अक्सर दिखते गहरे रंग एक उत्तेजक भाव की व्यंजना करते मालूम देते हैं। निर्देशक मनीष मित्रा के मुताबिक 'यह प्रस्तुति महज एक नाटक नहीं है। यह सामाजिक विक्षोभ को दिखाने वाला एक आंदोलन है। और हमारे उद्देश्य और विरोध के स्वर को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम भी।'
सुमन मुखोपाध्याय निर्देशित रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक 'बिसर्जन' की प्रस्तुति की सेट सज्जा में भी हिंसा और रौद्र भावों की अच्छी व्यंजना थी। मंच पर एक विशाल उठा हुआ पैर बना हुआ है जिसके लाल तलवे अलग से ध्यान खींचते हैं। एक ढलवां प्लेटफॉर्म प्रस्तुति की कई स्थितियों का केंद्र है। कई मौकों पर इसके नीचे गहरी लाल रोशनी उपर्युक्त भाव को और प्रबल बनाती है। विषय को देखते हुए यह निश्चित ही एक उपयुक्त मंच संरचना है। नाटक का विषय भी एक हिंसा पर ही केंद्रित है। राजा ने देवी को पशुबलि पर प्रतिबंध लगा दिया है। पुजारी रघुपति लोगों को राजा की इस आज्ञा के खिलाफ करने में लगा है। इस सिलसिले में कई तरह के एक्शन भी मंच पर देखने को मिलते हैं। रघुपति की भूमिका में गौतम हाल्दार प्रस्तुति में दमदार थे।

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