Saturday, May 14, 2011

कोर्ट मार्शल और सबसे बड़ा सवाल

कोर्ट मार्शल पिछले दो दशकों में हिंदी थिएटर में सबसे ज्यादा खेला गया नाटक है। वह यों तो स्वदेश दीपक की रचना है, पर उसका रंगमंचीय संस्कार रंजीत कपूर ने किया था। उनके निर्देशन में पीयूष मिश्रा और गजराज राव जैसे अभिनेताओं के साथ वह पहली बार 1991 में खेला गया था। तब से विभिन्न थिएटर ग्रुप लगातार उसे खेल रहे हैं। इधर रंजीत कपूर ने इसकी एक नई प्रस्तुति तैयार की है। लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादेमी के छात्रों के लिए निर्देशित इस प्रस्तुति का श्रीराम सेंटर में मंचन किया गया। 'कोर्ट मार्शल' की विशेषता है कि वह दर्शक को मोहलत नहीं देता। वह हमारी दलिद्दर सामाजिकता का एक युक्तिपूर्ण और डि-रोमांटिसाइज्ड पाठ है। उसकी यह विशेषता है कि दलित विमर्श की अत्युक्तियों के बगैर वह ऐसी सही जगह चोट करता है कि बिलबिलाते वर्णवाद को खुद ही अपना चोगा फेंककर नंगा हो जाना पड़ता है। यह नाटक कला में विचार की तार्किक एप्रोच का भी एक अच्छा उदाहरण है। सच को छुपाना एक बात है, उसके प्रति उदासीन रहना दूसरी। रामचंदर का वकील विकाश राय जब पर्त दर पर्त इस उदासीनता को उघाड़ता है, तो वहां एक बड़ा भारी अन्याय छिपा नजर आता है। पूरा नाटक एक ही दृश्य संरचना में संपन्न होता है। अपनी नाटकीय गति, विषय की सामयिकता, न्यूनतम मंचीय तामझाम और अभिनय की प्रचुर संभावनाओं की वजह से किसी भी रंगकर्मी के लिए यह एक आदर्श नाटक कहा जाएगा।
रामचंदर ने अपने अफसर की हत्या की- यह एक साबित तथ्य है। लेकिन विकाश राय के लिए महत्त्वपूर्ण है कि हत्या क्यों की गई। इस 'क्यों' को सुलझाने में खुद रामचंदर तक की कोई दिलचस्पी नहीं। लेकिन विकाश राय की है, क्योंकि उसके पिता जज हैं और एक भाई नक्सलवादी था। नाटक में सच के उदघाटन के ढांचे की प्रामाणिकता उसकी एक बड़ी सफलता है। अतीत में विजय तेंदुलकर ने 'खामोश अदालत जारी है' में सच के क्रमिक उदघाटन के एक ऐसे ही कथानक के लिए एक बनावटी स्थिति का उपयोग किया गया था, जबकि जे बी प्रीस्ले के 'एन इंस्पेक्टर काल्स' का सच अपनी सायास नैतिकता की वजह से प्रामाणिक मालूम नहीं देता। लेकिन यहां सच तक पहुंचने के इच्छुक विकाश राय के बरक्स सुनवाई का मुखिया कर्नल सूरत सिंह एक अनुशासन प्रिय अफसर है। अपने अनुशासन में वह चीजों को सुसंगत तरह से बरतने का आदी है। सुनवाई के सही दिशा में जाने का यह एक तार्किक आधार है। इसके अलावा रंजीत कपूर का मंच कौशल इस प्रस्तुति में एक बार फिर अपनी सटीक चुस्ती के साथ दिखता है। उनके गठन में कुछ ऐसा है कि दर्शक के पास दृश्य से परे जाने की कोई मोहलत नहीं होती। शायद यह पाठ के तनाव में है, या पात्रों के अभिनय में, या दृश्यों की गति में, संगीत में या इन सबके समुच्चय में। मेकअप की कमी अलबत्ता जरूर दिखाई देती है। जैसे कि कर्नल सूरत सिंह बने प्रदीप भारती अपनी शक्लो सूरत में किरदार से कहीं ज्यादा युवा लगते हैं। कई जगह अंडरप्ले आदि चूकें भी दिखती हैं, पर पूरी प्रस्तुति के स्तर पर वे खुद ब खुद नजरअंदाज होकर रह जाती हैं। विकाश राय की भूमिका में आलोक पांडे में अच्छी एनर्जी थी, जबकि बीडी कपूर बने मनोज शर्मा अपनी देहभाषा में प्रभावित करते हैं।
इससे पहले रंजीत कपूर के ही निर्देशन में एक लघु प्रस्तुति 'सबसे बड़ा सवाल' का भी मंचन किया गया। मोहन राकेश लिखित यह एक हास्य नाटक था। लो ग्रेड वर्कर्स सोसाइटी की मीटिंग हो रही है। लेकिन समूची मीटिंग कई विषयांतरित नुक्तों और आपत्तियों में ही अटक कर रह जाती है। जैसे कि 'भाइयो और बहनो' नहीं 'बहनो और भाइयो' होना चाहिए, कि संस्था का नाम विदेशी भाषा अंग्रेजी में न होकर हिंदी में होना चाहिए, कि असल में संस्था का नाम निम्न स्तर कर्मचारी समाज निम्न शब्द की वजह से मंजूर नहीं किया जा सकता, वगैरह। कर्मचारियों के हितों की मांग अचानक निम्न शब्द की व्याख्या में आकर अटक जाती है। एक सदस्य बताती है कि निम्न शब्द के दो अर्थ हैं- हीन और न्यून। इनमें से कौन सा मंजूर किया जाए। कई लाउड किरदार प्रस्तुति में लगातार एक चुहुल की वजह बने रहते हैं। मीटिंगों का समाजशास्त्र प्रस्तुति में बहुत अच्छी तरह व्यक्त हुआ है। सफाई करने वाले रामभरोसे और श्यामभरोसे राजेश और अभिषेक का अभिनय चरित्रों की दिलचस्प रंगत लिए था। कोर

अभिनय में एक दृश्य था

रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'क्षुधित पाषाण' याकि भूखे पत्थर की प्रस्तुति बुधवार को संगीत नाटक अकादेमी के मेघदूत प्रेक्षागृह में की गई। आलोक चटर्जी के एकल अभिनय वाली इस प्रस्तुति का आयोजन अकादेमी की कार्यक्रम श्रृंखला रवींद्र प्रणति के अंतर्गत किया गया। क्षुधित पाषाण में कहानी के भीतर एक कहानी है। कहानी सुना रहा नायक रूई का महसूल वसूलने वाला एक इंस्पेक्टर है। उसे बरीच नाम की एक सुरम्य जगह पर तैनाती मिली है। यह कहानी यहीं के एक जनशून्य प्रासाद की है, जहां उसे रहना है। प्रासाद के कर्मचारी दिन में तो उसकी सेवा को तत्पर हैं लेकिन शाम के बाद वे वहां नहीं रुकना चाहते। अकेले नायक को यहां कुछ ऐसा अदभुत देखने को मिलता है कि 'दिन की शाला पर एक दीर्घ कृष्ण यवनिका' के घिरते ही वह इसमें घिरने लगता है। रुकने के पहले रोज ही उसे कुछ रमणियां नजदीक से गुजरती दिखती हैं और फिर पानी में छपाक-छपाक के स्वर। और दिखती है अभिसार की प्रतीक्षा में एक अरब देश की तरुणी। नायक को लगा मानो यह अवास्तविक व्यापार ही जगत का एक मात्र सत्य हो। कि यथार्थ में साढ़े चार सौ रुपए पाने वाला रूई का महसूल इंस्पेक्टर श्रीमान का पुत्र मैं श्रीयुत...वगैरह एक भ्रम हो। अगले रोज प्रासाद के रहस्य में बंधा नायक खुद को रोक नहीं पाया। सीढ़ियां उसे एक कक्ष में ले गईं। अहर्निश ध्वनित होते उस विशाल जनशून्य कक्ष के बाद एक और कक्ष उसे दिखा, जहां अरब वेश की तरुणी उसे फिर दिखाई दी, और दिखाई दिया नंगी तलवार लिए खड़ा एक हब्शी। फिर उसने अपनी शैया के नीचे उसी रमणी का स्पष्ट अनुभव किया। यह सब क्या है! 'तफात जाओ....सब झूठ है'- हैरान नायक को महल के बाहर पागल मेहर अली के स्वर सुनाई देते हैं। पूछने पर वह कुछ नहीं बता पाता। लेकिन दफ्तर के बूढ़े क्लर्क करीम खां ने उसे बताया कि मेहर अली एकमात्र शख्स है जो महल में तीन दिन से ज्यादा रहने के बावजूद बच गया। ढाई सौ साल पहले महमूदशाह द्वितीय के बनवाए इस महल को लेकर नायक की बेचैन बढ़ती जा रही है। उसे पता चला कि महमूदशाह ने यह महल अपने भोगविलास के लिए बनवाया था। हर रोज यहां भोगविलास की महफिलें जुटतीं। वक्त बीता। महमूदशाह नहीं रहा, न महफिलें, पर उसके भोग की क्षुधा यहां के पत्थरों में बची रह गई। उसी भोगलिप्सा के कारण यह प्रासाद क्षुधित है, यह यहां हर रहने वाले को फाड़ खाना चाहता है।
कहानी यहां खत्म नहीं हुई। नायक उसके अहम सिरे को बताने को तत्पर है। सुना रहा नायक और सुन रहा लेखक दोनों रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, कि तभी नायक की ट्रेन आ जाती है। उत्सुक लेखक को मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। नायक जा चुका है। कहानी में फिर क्या हुआ, क्या हुआ होगा महल में- यह अब कैसे पता चले। कि तभी लेखक को समझ आता है कि अरे यह तो एक कपोलकल्पना थी। समय काटने का एक बहाना। एक किस्सा।
आलोक चटर्जी हिंदी रंगमंच के सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक हैं। स्पीच का वैभव देखना हो तो उनकी यह प्रस्तुति जरूर देखनी चाहिए। वे तत्सम भाषा को एक रंगमंचीय औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं और स्वर के उतार-चढ़ावों से दृश्य बनाते हैं। क्लर्क करीम खां पान खाए हुए बोलता है। कुछ स्थितियों में लगभग फुसफुसाहट से रहस्य का एक दृश्य बनता है। इस तरह भाषा जो दृश्य बनाती है आलोक चटर्जी उस भाषा के वाचिक रूप को ज्यादा दृश्य-सक्षम बनाते हैं। तरह-तरह की स्थितियों से गुजर रहा नायक पसीना-पसीना है, या मोहाविष्ट है या आसक्त या डरा हुआ और उत्तेजित। मंच पर एक गुलदान, एक मेज और एक शैया। आलोक इस स्पेस के बीच टहलते हुए अपने किरदार को अंजाम देते हैं। कहीं कोई अतिरिक्त नाटकीयता नहीं। हालांकि रोशनी के कुछ कल्पनाशील वृत्त प्रस्तुति को अधिक आकर्षक बना सकते थे। लेकिन उनके बगैर भी पूर्णतः अभिनय आधारित यह एक बेहतर प्रस्तुति थी। प्रस्तुति का लाइट डिजाइन शोभा चटर्जी का था।

कलावाद की कवायद

हिंदी थिएटर में हर कोई प्रभावात्मक किस्म के प्रयोग करने पर उतारू है। युवा रंगकर्मी राजकुमार रजक निर्देशित इलाहाबाद के थिएटर ग्रुप एक्स-ट्रा की प्रस्तुति 'सूरज का सातवां घोड़ा' कुछ इस तरह की है कि उसमें इस उपन्यास की जगह कोई भी कविता, कहानी, उपन्यास, आख्यान फिट किया जा सकता है। प्रस्तुति नैरेटिव का कोई प्रकार पेश नहीं करती, क्योंकि नैरेटिव का यहां कोई मूल्य ही नहीं है। वह एक दृश्यात्मक कलावाद में नौकर की तरह मौजूद है। एक जैसी पोशाक में छह अभिनेता मंच पर किसी शास्त्रीय ऑपेरा जैसे दृश्य निर्मित करते हैं। ये देहगतियों की लय से बनने वाले दृश्य हैं। इनमें कास्ट्यूम और प्रकाश योजना के रंग हैं। बुल्ले शाह के बोलों की सूफियाना रंगत से लेकर केसरिया बालमा आवो मोरे देस तक के आलाप हैं। दो लाठियों को पालकी में बदल देने जैसी दृश्य युक्तियां हैं। तरह-तरह की बुदबुदाहटें हैं। लेकिन कुछ नहीं है तो पाठ का संप्रेषण। प्रस्तुति के डिजाइन में संप्रेषण किसी प्रयोजन की तरह नजर ही नहीं आता। पूरी प्रस्तुति एक वायवीयता की शिकार मालूम देती है। उसके प्रभावात्मक प्रयोग में उपन्यास का एक सहयोगी इस्तेमाल भर हो ऐसा भी नहीं है, क्योंकि पूरा उपन्यास पात्रों द्वारा मंच पर नैरेट किया जाता है। प्रस्तुति में निर्देशक की रंग-प्रतिभा, कलाकारों का परिश्रम और काफी ऊंचे दर्जे का संगीत पक्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन एक नकलची किस्म का प्रस्तुति आइडिया उनको उनकी वास्तविक ऊंचाई तक पहुंचने नहीं देता।
एक अन्य प्रस्तुति मनीष मित्रा निर्देशित 'बिफोर द जर्मिनेशन' में एक अन्य प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह है स्थितियों के मर्म तक पहुंचता दिखने के लिए उन्हें ज्यादा ऐंद्रिक बनाना। प्रस्तुति ओरियाना फैलासी के अ लेटर टु अ चाइल्ड नेवर बॉर्न से प्रेरित है, जिसमें एक मां अपने गर्भस्थ शिशु से बात करती है और मां का बयान सुनने के बाद शिशु जन्म लेने से इनकार कर देता है। प्रस्तुति के शुरू में ही पीछे लगी स्क्रीन पर खजुराहो की इरोटिक मूर्तियों की छवियां दिखती हैं, फिर संभोग की स्थिति को दर्शाने वाला एक 'कलात्मक' दृश्य और फिर बलात्कार की हिंसा और और फिर नायिका का विलाप की ऊंचाई तक पहुंचता रुदन। मंच के एक छोर पर लाल कपड़े के घेरे में एक घड़ा, बीच के छोर पर आग और नरमुंड, अस्थि आदि। तंत्र साधना जैसे इस दृश्य के समांतर पीछे की स्क्रीन पर स्वस्तिक का निशान उभरता है और 'वैष्णव जन तो तेने कहिए..' के स्वर। मंच पर अक्सर दिखते गहरे रंग एक उत्तेजक भाव की व्यंजना करते मालूम देते हैं। निर्देशक मनीष मित्रा के मुताबिक 'यह प्रस्तुति महज एक नाटक नहीं है। यह सामाजिक विक्षोभ को दिखाने वाला एक आंदोलन है। और हमारे उद्देश्य और विरोध के स्वर को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम भी।'
सुमन मुखोपाध्याय निर्देशित रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक 'बिसर्जन' की प्रस्तुति की सेट सज्जा में भी हिंसा और रौद्र भावों की अच्छी व्यंजना थी। मंच पर एक विशाल उठा हुआ पैर बना हुआ है जिसके लाल तलवे अलग से ध्यान खींचते हैं। एक ढलवां प्लेटफॉर्म प्रस्तुति की कई स्थितियों का केंद्र है। कई मौकों पर इसके नीचे गहरी लाल रोशनी उपर्युक्त भाव को और प्रबल बनाती है। विषय को देखते हुए यह निश्चित ही एक उपयुक्त मंच संरचना है। नाटक का विषय भी एक हिंसा पर ही केंद्रित है। राजा ने देवी को पशुबलि पर प्रतिबंध लगा दिया है। पुजारी रघुपति लोगों को राजा की इस आज्ञा के खिलाफ करने में लगा है। इस सिलसिले में कई तरह के एक्शन भी मंच पर देखने को मिलते हैं। रघुपति की भूमिका में गौतम हाल्दार प्रस्तुति में दमदार थे।

Sunday, May 8, 2011

हाथरस शैली का रस

भोपाल के रवींद्र भवन में बीते सप्ताह नौटंकी-उत्सव का आयोजन किया। राज्य के संस्कृति संचालनालय के इस आयोजन में हाथरस शैली की नौटंकियां पेश की गईं। कानपुर शैली की तुलना में हाथरस शैली को गायकी प्रधान माना जाता है। बगैर स्वर को तोड़े लंबे-लंबे आलापों की गलेबाजी का इसमें काफी महत्त्व है। कई दृश्यों में अभिनेतागण इस हुनर का मुकाबला जैसा करते नजर आते हैं। कोई तय नहीं कि इस मुकाबले में गौण किरदार मुख्य किरदार से बाजी मार ले जाए। उत्सव के पहले दो दिन मथुरा के स्वस्तिक ग्रुप ने 'अमरसिंह राठौर' और 'हरिश्चंद्र तारामती' प्रस्तुतियां कीं। अमरसिंह राठौर बादशाह शाहजहां का बहादुर सिपहसालार है, जिससे 'राजपूतों का दुश्मन' वजीरेआला सलावत खां रंजिश पाले हुए है। अमर सिंह अपनी दुल्हन का गौना कराने दरबार से छुट्टी पर गया है। रास्ते में उसे प्यास से बेहाल एक पठान मिलता है। पानी पिलाने से वह अमर सिंह का मुरीद और दोस्त बन जाता है। उधर लौटने में देरी पर अमर सिंह पर साढ़े सात लाख रुपए जुर्माना लगा दिया गया है। लेकिन सवाल है कि जुर्माना वसूल कौन करे। गंवई अतिशोयक्ति की हद यह है कि नायक की नंगी तलवार से बादशाह भी डरता फिर रहा है। नायक एक ओर इतना जांबाज दूसरी ओर इतना भावुक भी है कि पत्नी हाड़ी रानी के इसरार ने उसे लाचार कर दिया है। 'इधर प्यारी का प्यार है उधर रजपूती शान, आह भला मैं क्या करूं हे मेरे भगवान'। प्यारी जुर्माना भरने के लिए अपना नौ करोड़ का हार देने को तैयार है, पर अमर सिंह के गुरूर को यह मंजूर नहीं। ऐसा वीर सैनिक आखिर मारा जाता है अपनों की ही दगाबाजी से। दोस्ती और बदले की कुछ और तफसीलों में पठान दोस्त और सलावत खां भी मारे जाते हैं और आखिर में बादशाह सलामत इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि 'न हिंदू बुरा है न मुसलमान बुरा है, आ जाए बुराई पे तो ये इंसान बुरा है'। प्रस्तुति के निर्देशक संदीपन नागर आधुनिक थिएटर से भी जुड़े हुए हैं, इसलिए उनकी प्रस्तुति में एक परिष्कार देखा जा सकता था। वे हाड़ी रानी के विलाप को रंगमंचीय दृश्य की ऊंचाई पर ले जाते हैं। हाड़ी रानी ने चूड़ियां तोड़ दी हैं, उसके बाल खुले हैं। पति की मौत पर उसका हृदयविदारक क्रंदन एक गंभीर दृश्य बन गया है। संदीपन नागर नौटंकी के अनगढ़पन को कम करके उसे थीम पर ज्यादा फोकस करते हैं और साथ ही अभिनय की हर संभावना का पूरा उपयोग करते हैं। वे संवादों को नक्कारे और हारमोनियम के स्वरों में खो जाने से बचाते हैं। इससे विषयवस्तु की स्पष्टता बनी रहती है। वस्त्र विन्यास में चटकपन और प्रकाश योजना के जरिए भी वे दृश्य का प्रभाव बढ़ाने में सफल रहे हैं। पारंपरिक नौटंकी में संवादों की लंतरानियों को जिस बीच नक्कारा और हारमोनियम कुछ और ऊंचाई पर ले जा रहे होते हैं उस बीच इशारों में घटित होने वाला अभिनय एक दिलचस्प शै है। तकरार या मान मनौव्वल के घटित हो चुके दृश्य का यह 'एक्सटेंशन' मानो एक छाया-दृश्य होता है। संदीपन नागर ने इसका अच्छा इस्तेमाल किया है।
अगले दिन की प्रस्तुति हरिश्चंद्र तारामती में पारंपरिक नौटंकी के लटके -झटके अपने पूरे विस्तार के साथ मौजूद थे। हरिश्चंद्र परिवार की व्यथा-कथा को अंजाम देने में लगे मुनिवर से अचानक एक पात्र आकर कहता है कि कुछ लोक कलाकार उनका मनोरंजन करने की अनुमति चाहते हैं। और फिर दो लोक कलाकार स्त्रियां ठुमके लगाकर गाती हुई दिखाई देती हैं- 'मेरे बालम छोटे से नन्हें से, पान खिला दे मेरी जान'। मुनिवर हरिश्चंद्र से संकल्प में कुंजी और लगाम लेकर उनका सब कुछ ले चुके हैं, अब दक्षिणा में देने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा है। ऐसे में उन्हें काशी ले जाकर बेच दिया जाता है। हरिश्चंद्र तारामती भारतीय शुद्धतावादी मानस का एक विलक्षण आख्यान है। मुनिवर की कुटिलता से निस्संग हरिश्चंद्र अपने सत्य की रक्षा में सन्नद्ध है। नगर छोड़ने की मार्मिक स्थिति निकल चुकी, पैरों में छाले पड़े हैं, कंठ सूख चुके हैं पर तीनों प्राणियों की दृढ़ता में कोई कमी नहीं। तारामती कहती है- 'चाहे भूखे रहें चाहे प्यासे रहें, कैसे भी हों दुखों को उठाएंगे हम/ इनके कहने में जो तुम आओ पिया, सत्य न रहेगा खुदा की कसम'। नौटंकी में इस भीषण स्थिति के बरक्स कॉमिक रिलीफ का भी प्रबंध है। काशी में तीनों प्राणियों को खरीदने के लिए तरह तरह के खरीदार दिखते हैं। मारवाड़ का एक शख्स जो उन्हें खरीदने आया है उसे मुनिवर की भाषा समझ नहीं आ रही। वो तीन प्राणी को तीन पाव पानी समझता है और तीन मनुष्य को तीन मन भुस। तब मुनिवर उसी की भाषा में बताते हैं- एक बींदनी, एक मोठ्यार, एक तापड़। और फिर कहते हैं 'अब आया लैन पर'। इसी तरह एक खरीदार कहती है- 'हमें लेडीज चाहिए'। किसी दौर में रात भर चलने वाली नौटंकी को उपकथाओं से एक विस्तार मिलता था। पहली नौटंकी में पठान दोस्त की तरह यहां माली-मालन की उपकथा है।
कानपुरी शैली में जो रस बहरे तबील और नक्कारे की जुगलबंदी से बनता है हाथरस शैली में वह गलेबाजी की रागदारी से बनता है। बादशाह और मुनिवर बने मुन्ना मास्टर और रामसिंह बने अमरनाथ वर्मा इसके पारंगतों में शुमार किए जाते हैं। इनके अलावा हाड़ीरानी और तारामती बनीं सितारा देवी में भी गायकी और अभिनय की बड़ी प्रतिभा सहज दिखाई देती है। प्रस्तुति के निर्देशक मोहन स्वरूप भाटिया हैं। उनका कहना है कि नौटंकी को राष्ट्रीय ऑपेरा का दर्जा दिया जाना चाहिए।

Monday, May 2, 2011

राजस्थानी गोग स्वांग

कुछ अरसा पहले त्रिवेणी सभागार में हिंदी अकादमी की ओर से राजस्थानी गोग स्वांग का मंचन कराया गया। सांबर के राजा की इस कथा को मंच पर महबूब खिलाड़ी एंड पार्टी ने पेश किया। प्रस्तुति के लिए मंच पर सिर्फ तीन माइक खड़े कर दिए गए थे। पात्रगण इन्हीं के सामने खड़े होकर अपनी गायकी और अभिनय का मुजाहिरा करते हैं। स्त्री पात्रों में भी पुरुष ही हैं। राजस्थानी चटकीले रंग हर किसी की वेशभूषा में दिखाई देते हैं। स्वांग की विधा नाटक के ढांचे के साथ कैसे खेल करती है, यह प्रस्तुति उसका एक नायाब उदाहरण थी। एक कहानीनुमा कुछ है जिसके बीच लंबे-लंबे आलापों वाली गायकी और पारंपरिक नाच वगैरह भी चलते रहते हैं। स्वांग का नायक पगड़ी, मूछों, काजल, कटार वाला राजा गोप चवाण है। एक दिन उसके पास उसकी मौसीमां ने आकर कहा कि 'बेटे गोप चवाण मैं तेरी जगह पे अपने बेटों अर्जन और सर्जन को राज कराना चाहूं हूं।' लेकिन भांजे के बात न मानने पर उसने कहा 'आज से जैसे राम के लिए कैकेयी वैसे ही तेरे लिए मैं'। मौसी के बाद मां आई पर गोप चवाण नहीं माना। इस वाकये के बाद मौसीमां का बेटा सर्जन सिंह जाकर बादशाह सलामत से मिल लेता है। वो बताता है कि मायके जा रही गोप चवाण की बीवी बाई सा के पास दस लाख रुपए हैं। वो रुपए लूटकर बादशाह को दे देगा ताकि वो उसे राजा बनाने के लिए गोप चवाण से युद्ध करे। अपने इस इरादे पर अमल के लिए वो मायके जा रही बाई सा के पास जा पहुंचा और बोला- 'बाई सा मैं आपको लूटने को आया हूं। आप रकम दे दो, वरना मैं आपकी बेस्ती करूंगा।' क्षत्राणी बाई सा ने उसे रकम तो दे दी लेकिन साथ ही कह दिया- 'तू ले जा, पर याद रखियो, तीसरे से चौथे दिन का सूरज तू नहीं देख पाएगा।' यह किस्सा जाकर उसने गोप चवाण को सुनाया और बदला लेने के लिए भड़काया। पगड़ी पहने हुए गोप ने जब टोपी पहने बादशाह सलामत से इस बारे में दरयाफ्त की तो उसने कहा- 'चोर हमारे पेट में है'। लब्बोलुबाब यह कि कहीं पर युद्ध हुआ जिसका अंतिम दृश्य ही स्वांग में घटित होता है। गोप चवाण मोटा सा बेंत लिए खड़ा है जिससे वो बादशाह सलामत की ओर से लड़ने आए अपने ही भांजे को एक ही चोट में मार गिराकर युद्ध जीत लेता है। लेकिन जब गोप चवाण की मां को पता चला तो उसने कहा- 'तूने पालू भानजो को मार दियो पापी। चले जा मेरी आंख के सामने से।' इसके बाद गोप चवाण 12 साल तक जंगल में भटकता रहा।
स्वांग को देखते हुए लगता है कि जैसे अभिनय कोई मसला नहीं है। पात्रों को कहानी की एक लीक और मोटे तौर पर अपना किरदार मालूम है जिसके आधार पर वे अभिनय करने का स्वांग करते हैं। असली चीज है कहानी के छोटे-मोटे मसलों पर देर तक चलती गलेबाजी और उसे कुछ और जोरदार बनाते दो छोटे नक्कारे और हारमोनियम। ये मुद्दे बेहद मामूली हैं, जैसे कि बाई सा मायके जाए या नहीं, पर हाथरस शैली की नौटंकी से मिलती-जुलती गलेबाजी में देर तक उनपर बहस चलती है। हरियाणवी स्वांग की तुलना में राजस्थानी स्वांग ज्यादा उन्मुक्त मालूम देता है, क्योंकि सामाजिक नैतिकता के किसी संदेश का कोई बंधापन यहां नहीं है। अभिनय के लिहाज से अहम किरदार उसमें एक है- जो कभी हरकारा गोपाल बना हुआ है, कभी बादशाह का कारिंदा शकूर। दरअसल वो स्वांग का विदूषक है। उसके शरीर की लय देखते ही बनती है। बाद में वो शहर भटिंडा का एक मौलवी भी बना हुआ है। वह गोप चवाण को 'मोहम्मडन' बनाने के लिए उससे 'ला इल्लाह लिल्लिलाह रसूल लिल्लाह' बुलवाता है, और इस काम में बार-बार उसके नाकाम रहने पर आखिर उसे दी टोपी के जरिए उसे मोहम्मडन घोषित कर देता है। मंच पर सब कुछ इतना अनौपचारिक है कि नेपथ्य की ज्यादा जरूरत मालूम नहीं देती। जो पात्र माइक पर खड़ा है दृश्य में असल में वही पात्र है। बाकी पात्र उनके पीछे की जगह में टहलते या बैठे नजर आते हैं। बीच बीच में जरूरत के मुताबिक हारमोनियम साज भी मायके जा रही बाई सा के अंगरक्षक की भूमिका निभा कर वापस अपनी जगह पहुंच जाता है। लोक शैलियों की एक सहज तल्लीनता आम तौर पर प्रायोजित शहरी मंचों पर उस तरह बनी नहीं रह पाती। लेकिन स्वांग की इस प्रस्तुति के साथ ऐसा नहीं था। प्रस्तुति के आखिर में एक पात्र ने माइक पर यह भी बताया कि 'हमारा प्रोग्राम अब खतम हो गया है'।