Wednesday, March 16, 2011

ममताजभाई पतंगवाले

पिछले कुछ वर्षों के दौरान युवा आलेखकार और निर्देशक मानव कौल ने हिंदी रंगमंच में एक महत्त्वपूर्ण जगह बनाई है। हर साल दिए जाने वाले महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड (मेटा) के लिए इस साल उनके दो नाटक नामित किए गए। इनमें से एक 'ममताज भाई पतंगवाले' दो अलग-अलग वक्तों की कहानी है। करीब बीस-पच्चीस साल पहले गुजर चुके और हमारे आज के वक्त की। इस बीच समय की गति में कोई ऐसा पेंच रहा है कि व्यक्ति वो नहीं रहा जो वह था। यह बदला हुआ व्यक्ति पूरी तरह अन्यमनस्क है। वह चीजों में रस लेता हुआ दिखता है, लेकिन तत्क्षण ही हर रसास्वाद को भूल जाता है। वह फुर्तीला और स्मार्ट हो गया है, लेकिन उसमें अपने वक्त की कोई तल्लीनता नहीं है। वह फोन पर नया जोक सुनकर ठहाका लगाता है और लगभग भूल चुका है कि उसके बचपन में घर के पड़ोस में एक सच्चे पतंगबाज ममताज भाई थे। नाटक फ्लैशबैक में जाकर उस पूरे जीवन को याद करता है जिसमें ममताजभाई के अलावा अवस्थी मास्टर साहब, मां, बहन, दोस्त आनंद और इनके केंद्र में पतंगबाजी का दीवाना विकी हुआ करता था, जो मानता है कि ममताजभाई के बीवी-बच्चे नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो पतंगबाज हैं न! उधर परीक्षा की वजह से जब उसके बाहर निकलने पर रोक लगा दी जाती है तो ममताजभाई को भी पता है कि 'विकी पतंगबाज है, जरूर वापस आएगा'। यहां तक कि वो उसे ढूंढ़ते हुए उसके घर पहुंच जाते हैं। उस पुराने वक्त में गली में पतंग लूटने की होड़ लगी है। कंधे पर अपनी बहनों को बिठाए लड़के ऊंचे से ऊंचे जाकर पतंग लूट लेना चाहते हैं। विकी को मालूम है कि पतंग को काटने के लिए ममजातभाई ने जरूर कत्थई वाला मांजा लगाया होगा, जबकि उसके दोस्त आनंद को सद्दी और मांजे का फर्क भी ठीक से नहीं पता।
अब वर्षों के अंतराल के बाद विकी के पास उसी दोस्त आनंद का फोन आया है कि ममताजभाई बीमार हैं और उससे मिलना चाहते हैं। एक लंबी भूमिका के बाद दो वक्तों के मिलन का यह एक संवेदनशील दृश्य है। स्टेशन पर लेने आए दोस्त की साइकिल के कैरियर पर बैठा विकी देख रहा है कि बचपन की जगह में सब कुछ बदल चुका है। दृश्य में साइकिल अपने स्टैंड पर स्थिर है लेकिन पीछे परदे पर बहुत सी आकृतियां उभरती हुई दिखती हैं। एक बैल, एक पेड़, एक बटोही, एक साइकिल। अपने घर पर इस बीच बूढ़े और जर्जर हो चुके ममताजभाई में अब भी अपनी जल चुकी दुकान को फिर से खोलने की हसरत है। विकी उनसे मिलकर काफी बेचैन हो गया है। उसे कहीं कोई बदबू महसूस होती है, कहीं कुछ जलता हुआ। वह यहां नहीं रुक सकता। उसे खुद को रिलैक्स करने के लिए एक अदद लतीफे की दरकार है। स्टेशन पहुंचते ही वह अपने मुंबई के दोस्त को इसके लिए फोन करता है।
प्रस्तुति पूर्वार्ध में काफी बिखरी हुई है। इसकी वजह है कि मानव कौल स्थितियों को किसी यथार्थपरक तरतीब में बरतने के बजाय अतिनाटकीय मुहावरे की तरकीब में बरतते हैं। उसमें 'काइट इज फ्लाइंग' जैसे वाक्यों में अपना अंग्रेजी ज्ञान बघारते जोकर नुमा अवस्थी मास्टर साहब हैं, 'कैन आई गो फॉर सूसू' की इजाजत मांगते छात्र हैं और अपने किरदार के आपे से बाहर नजर आती मां है। इस दौरान मंच पर काफी अस्तव्यस्तता है, और इससे विषय की संवेदना पर एक निश्चित प्रभाव पड़ता है। इन दिनों इस तरह की किंचित एब्सर्ड दृश्य प्रणाली का ठीक से अनुशीलन न कर पाने के बावजूद उसे शैली की तरह इस्तेमाल करने का चलन काफी बढ़ गया है। हालांकि दृश्यों की अस्तव्यस्तता में एक ही किरदार में दो पात्रों के इस्तेमाल की एक अच्छी युक्ति ठीक से उभर नहीं पाई है। इस युक्ति में छोटे विकी के साथ एक बड़ा विकी भी दिखाई देता है। बड़ा विकी इसमें वो संवाद बोलता है जो छोटा विकी बोलना चाहता है। जैसे कि मां जब ममताजभाई को घर से चले जाने को कहती है तो बड़ा विकी कहता है- 'आपको बोलने की क्या जरूरत है, ये मेरे और ममताजभाई के बीच की बात है'। लेकिन पूर्वार्ध के बिखरेपन में आलेख की ये बारीकियां निष्प्रभावी ढंग से घटित होकर रह जाती हैं। प्रस्तुति को इस साल मेटा की नौ श्रेणियों में नामित किया गया, लेकिन उसे सिर्फ एक श्रेणी (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री) में ही पुरस्कार हासिल हो सका। जिन श्रेणियों में उसे नामित किया गया उनमें से एक कोरियोग्राफी की भी थी। मानव कौल पदचापों की धमक से एक दृश्य बनाते हैं। इस तरह वे अपनी शैली को कुछ चमकदार बनाने की कोशिश करते हैं। अभिनय की दृष्टि से आसिफ बसरा प्रस्तुति में काफी बेहतर थे।

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