Friday, August 6, 2010

मेन विदाउ शेडो

इधर नाटक देखना बहुत कम हो गया है। लेकिन कुछ साल पहले तक हर सप्ताह तीन-चार प्रस्तुतियां देखने का सिलसिला था। इतनी देखी हुई प्रस्तुतियों में से किसी एक को सर्वोत्तम के रूप में छांटना मुश्किल लगता है। निर्देशकीय कल्पनाशीलता के एक से एक उदाहरण याद आते हैं। करीब 22-24 साल पहले देखी वीरेंद्र सक्सेना निर्देशित ये आदमी ये चूहे (जिसकी अब धुंधली याद ही बाकी है) से लेकर मोहन महर्षि की जोसफ का मुकदमा, रंजीत कपूर की चेखव की दुनिया, राजेंद्र नाथ निर्देशित तीसवीं सदी, स्वप्न संतति, हाइनर मुलर की अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि हासिल करने वाली प्रस्तुति रेजिस्टिबल राइज ऑफ आर्तुरो उई और इसमें मार्टिन वुटके का लाजवाब अभिनय, अनूठे ग्राफिक प्रभावों वाली जर्मन प्रस्तुति इंटू द ब्लू, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय छात्रों की प्रस्तुति ट्रोजन वार.....आदि कितनी ही प्रस्तुतियां हैं जो अलग अलग वजहों से कई सालों बाद भी रंग-स्मृति का खास हिस्सा बनी हुई हैं। लेकिन इनके अलावा एक प्रस्तुति ऐसी है जो देखने के दिन से आज तक लगता है जैसे दिमाग में अटकी है। यह श्रीराम सेंटर एक्टिंग कोर्स के छात्रों की प्रस्तुति थी- ज्यां पाल सार्त्र का नाटक मेन विदाउट शेडो। इसका निर्देशन मुश्ताक काक ने किया था और लगभग महत्त्वहीन तरह से इसका मंचन सेंटर के ऑडिटोरियम में किया गया था। प्रस्तुति के दौरान उपस्थित बहुत कम दर्शक या तो एक्टिंग कोर्स के अन्य छात्र थे, या अभिनेताओं के दोस्त और परिवार वाले। हिंदी में ज्यां पाल सार्त्र के अधिक नाटक उपलब्ध नहीं हैं। इस नाटक का अनुवाद दिवंगत जे एन कौशल ने किया है। और इसे इसलिए अच्छा कहा जा सकता है कि नाटक के बौद्धिक तेज को उन्होंने हिंदी की बनावटी मुहावरेबाजी से नष्ट नहीं होने दिया है, जो कि ज्यादातर पश्चिमी नाटकों के हिंदी अनुवादों की समस्या रही है।

नाटक में सार्त्र ने अपने अस्तित्ववाद संबंधी विचारों को जिस कुशलता से पिरोया है वह तनाव जे एन कौशल के अनुवाद में भी दिखाई देता है। दर्शन एक उबाऊ चीज है, लेकिन कोई दार्शनिक विचार अगर कसे हुए कथानक में तनाव और उत्सुकता के ढांचे में पेश होता है तो अधिक ग्राह्य होता है। सार्त्र का मानना था कि विचार वास्तविक जीवन के अनुभवों का परिणाम होते हैं और उपन्यास या नाटक इन बुनियादी अनुभवों को ज्यादा अच्छी तरह पेश कर सकते हैं। नाटक में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान फ्रेंच रेजिस्टेंस मूवमेंट के पांच क्रांतिकारी-एक स्त्री, एक किशोर और तीन पुरुष- एक कमरे में कैद हैं। एक असफल ऑपरेशन में पकड़े जाने के बाद उन्हें यहां लाया गया है। एक ओर ये सभी इस ग्लानि से जूझ रहे हैं कि उनके नाकाम ऑपरेशन की वजह से हुए खून-खराबे में कई बेगुनाह नागरिकों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी, दूसरी ओर सैनिकों द्वारा किए जाने वाले टॉर्चर के लिए भी खुद को तैयार कर रहे हैं। उनका लीडर नाकाम ऑपरेशन के बाद किसी तरह बच निकला, और अब उनसे लीडर का पता ठिकाना जानने के लिए बारी बारी से पूछताछ की जा रही है। सैनिकों के टॉर्चर का मुकाबला किस तरह किया जाए, कैदी इसी पर चर्चा कर रहे हैं। क्या वे टॉर्चर के आगे टूट जाएगे, क्या इसलिए सैनिकों के आगे सरेंडर कर देना चाहिए। इस क्षण में लीडर के बारे में जानकारी को गोपनीय रखना ही उनका काम है। सब कुछ नष्ट हो चुका है, लेकिन यह काम उनके लिए है। एक कैदी खुद को टॉर्चर की उस हद के लिए तैयार कर रहा है, जब दिमाग बिल्कुल सुन्न होकर चोट को भी महसूस नहीं कर पाएगा। लेकिन कम उम्र किशोर टॉर्चर के दौरान की चीखों को लेकर दहशत में है, वो अपनी बहन के साथ दुर्योग से इस स्थिति में आ पहुंचा है। उसकी लीडर के ठिकाने की गोपनीयता में कोई दिलचस्पी नहीं। उसका कहना है कि सैनिकों की यंत्रणा से बचने के लिए वो उन्हें सब कुछ बता देगा। उसका यह रुख एक क्रांतिकारी द्वारा उसकी हत्या का कारण बनता है, क्योंकि राज को न खुलने देना ही उसका काम है.... एक कैदी जेल से बच निकलने की योजना बनाता है। लेकिन सवाल है कि आंदोलन टूट चुका है, निकल भी गए तो कहां जाएंगे...? वो कहता है- दूर खदानों में कहीं मजदूरों का आंदोलन चल रहा है वहीं जाएंगे।... यानी व्यक्ति जो है उसका कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि उसका जीवन उसका अपना चुनाव है। अस्तित्ववाद मानता है कि जीवन की सारी बाधाओं, सारी असंगति के बावजूद व्यक्ति अपने लिए खुद जिम्मेदार है। यह खुद उस पर निर्भर है कि वह अपने लिए क्या चुनता है। यही इस नाटक के पात्रों के व्यवहार में भी दिखाई देता है। चाहे वे पूछताछ करने वाले सैनिक हों या अचानक किसी अन्य मामले में पकड़ कर लाया गया लीडर। इस लीडर और कैदियों के संबंध में भी कई द्वंद्व हैं। उनकी बातचीत में ये सामने आते हैं।...

इस नाटक से पहले इंसान के वजूद के सवाल का ऐसा डि-रोमांटिसाइज्ड पाठ मैंने मंच पर नहीं देखा था। प्रस्तुति के निर्देशक मुश्ताक काक के बारे में जानता हूं। वे कहीं से भी 'विचारधारा' वाले व्यक्ति नहीं हैं। शायद इसीलिए इस प्रस्तुति में उन्होंने भी 'अपने काम को' सही तरह से अंजाम दिया है। मुश्ताक ने सामान्य लेकिन सटीक वेशभूषा, सादगीपूर्ण लेकिन कल्पनाशील मंच योजना (याद आ रहा है कि कैदियों के कमरे में एक कोने में कुछ टूटे फूटे कुर्सी-मेजें वगैरह डालकर उसे एक कबाड़खानेनुमा उपयुक्त शक्ल दी गई थी) प्रस्तुति के अभिनेता बिल्कुल नए लड़के थे, लेकिन यह मुश्ताक का ही कौशल था कि मंच पर सब कुछ पूरी तरह चुस्त था। इसी नाटक की कुछ और प्रस्तुतियां या अंश भी देखे हैं, लेकिन उनमें अर्थ का ऐसा अनर्थ किया गया था कि किसी को रोना आ जाए। हिंदी विचित्रताओं की दुनिया है, तर्कहीनता का एक दुविधाहीन संसार। इस संसार के मलबे में इस प्रस्तुति की चमक हमेशा याद रहती है।


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