Saturday, September 19, 2009

गुड़

गुड़ पिता को बहुत पसंद था। खाना खाते वक्त अंतिम रोटी वे उसके साथ चाव से खाते थे। अम्मां से कहते- `थोड़ा मिष्टान्न दो भाई..।' और अम्मां उन्हें गुड़ निकाल कर दे देतीं।
    पिता जिंदगी की गति में रमे हुए आदमी थे। वे अभावों से घबराने वाले व्यक्ति नहीं थे। अभावों में वे प्रायः कोई न कोई सार्थकता तलाश लिया करते थे। अपने बचपन और देहात की चर्चा करते हुए अक्सर वे गुड़ का जिक्र किया करते थे। तब गांव में बिजली नहीं थी और गन्नों की पेराई के लिए मशीन बैलों की ऊर्जा से चलाई जाती थी। रात-रात भर गुड़ पकाया जाता था। लोग भट्ठे की आग तापते बैठे रहते, आलू और शकरकंद भूनकर खाते और जोर-जोर से आल्हा गाते। 
    गुड़ की उपस्थिति गांव के घरों में अनिवार्य है। दादी उसे घड़े में बंद करके रखती थीं। त्योहारों में वहां गुड़ के पुए बनते हैं और आज भी वहां गर्मी की दोपहरियों में आगंतुक के आगे गुड़ का शरबत ही पेश किया जाता है। एक बार जून की भद्दर गर्मी में भरी दोपहर गांव पहुंचने पर मैंने भी इस शरबत का स्वाद चखा था। गुड़ के शरबत की मिठास थोड़ी कसैली होती है। दादी ने लोटा भर बनाया था, पर मेरे लिए एक गिलास पीना भी भारी पड़ गया था। गुड़ मुझे खास पसंद नहीं, यह बात पिता को खास अच्छी नहीं लगती थी। मुझे सुनाते हुए अक्सर वे गांव के आयुर्वेदाचार्य मुंशी जी की गुड़ पर आस्था का हवाला देते।
    एक बार घर में गरीबी बहुत ज्यादा हो गई थी। पिता जान-पहचान के एक परचूनिये से बार-बार उधार सामान लाते थे। गुड़ की मात्रा वे ज्यादा लाने लगे थे। वे बताते थे कि एक किलो चीनी के दाम में डेढ़ किलो गुड़ मिलता है। उन दिनों गुड़ की चाय के फायदे वे बार- बार गिनाते थे।...
    उन्हीं दिनों की बात है, एक दफे जब पड़ोस में रहने वाली दुबाइन (मिसेज दुबे को अम्मां दुबाइन कहती थीं) घर आई थीं तो अम्मां ने उन्हें भी गुड़ की चाय पिलाई थी। इसके कुछ दिन बाद एक शाम को पड़ोस के घर से खेलकर लौटी मेरी छोटी बहन मुन्नी ने बताया कि आंटी पूछ रही थीं, क्या तुम्हारे यहां गुड़ की चाय पी जाती है। अम्मां ने इस बात पर बड़ा कोहराम मचाया था। उनका कहना था कि वे गरीबी और गुड़ दोनों से ऊब चुकी हैं और आत्महत्या करने जा रही हैं। पिता ऐसी स्थितियों के अभ्यस्त थे। वे इनसे ऊबते नहीं थे। वे कहते थे, मरने वाला व्यक्ति ऐलान करके नहीं मरता।
    यह बात कई साल पहले की है, जब देश में विदेशी मुद्रा का संकट पैदा हो गया था। किसी सरकारी मंत्री ने चीनी की आपूर्ति बढ़ाने के लिए देहातों में बनने वाले गुड़ पर पाबंदी की बात कही थी। पिता उन दिनों डायबिटीज के मरीज हो चुके थे और खुद कई सारी पाबंदियों के शिकार थे। प्रायः वे झुंझलाए हुए रहते थे। यह खबर उन्होंने अखबार में पढ़ी। खबर पढ़ने के बाद उन्होंने अखबार को मोड़कर एक ओर रख दिया और कमरे से बाहर चले गए। बाहर काफी देर तक धूप में वे बिल्कुल चुपचाप बैठे रहे। अचानक वे उठे और भीतर आकर अम्मां से बोले- `मुझे गुड़ दो!'
   अम्मां डर गईं, बोलीं- `आत्महत्या करने चले हो क्या?'
   पर पिता जैसे किसी जुनून में थे, उनसे कुछ भी कहना बेकार था। अम्मां को उन्होंने एक ओर धकेल दिया, और जाकर गुड़ का पीपा निकाल लाए। पीपे से गुड़ निकाल कर खाते पिता की आंखों में एक दैन्य था। पिछले करीब दो साल से उन्होंने गुड़ नहीं खाया था। मैं हतप्रभ था। दो साल के अतृप्त पिता ने देखते-देखते काफी सारा गुड़ खा डाला। खाते-खाते वे निढाल होने लगे। सब घबरा उठे। डॉक्टर को बुलाया गया। उनका रक्तचाप आसमान छू रहा था।....
    कुछ दिनों बाद पिता जब बिस्तर पर थे, मैंने उनसे पूछा था कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। पिता ने रुक-रुक कर जवाब दिया था, कि बेटे अतृप्त रहकर जीते रहने से अच्छा है, तृप्त होकर मर जाना।
    इसके कुछ दिनों बाद पिता चल बसे थे।
    अब हमारे घर में पिता की मृत्यु एक पुरानी बात हो चुकी है। ओस खा गए शीशे की तरह पिता धुंधले होते जा रहे हैं। अम्मां जरूर कभी-कभार जिक्र उठने पर कह देती हैं- `तुम्हारे पिता गुड़हा थे।'...पर पिता सिर्फ गुड़हा नहीं थे, वे और भी कुछ थे। यह रहस्य सिर्फ मुझे पता है कि वे क्या थे।
    

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